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काज़ी नज़रूल इस्लाम के लिखे चुनिंदा 3 गीत

kazi nazrul islam poems in hindi
                
                                                         
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इस विजन में अकेली अनमनी सी क्यो बैठी हो
चलो गोरी, पनिया भरने चलो।
वन-भूमि विकल होकर कहती है:
"चलो, जल की ओर चलो।"
जल-लहरी सी छल-छल स्वर में पुकार रही है।
बगुलों के उड़ते हुए पंखों में 
दिन बीता जाता है,
विहग की गोद में विहगी छिपी हुई है
अबाबील रो-रोकर अपनी प्रिया से विदा हो रहा है,
बरवा धुन में बंशी बज रही है।

सांझ अपना मुख चंदा के दर्पण में देख रही है,
अपने बालोे में उसने छाया-पथ की मांग काढ़ ली है,
छाया-नटी कानन-पुर में नाच रही है,
लता-रूपी कबरी पीछे से पैंग मार रही है।

ननदी कहती है - "बहू, दिन ढल गया है,
पानी भरना है तो चलो"
दूर नदी काली होती जाती है,
नगर नागरिका के वेश में संवर रहा है।

मांझी स्नान वाले घाट में अपनी नाम बांध रहा है,
पथिक जनहीन पथ पर चला जा रहा है,
किसकी याद में तुम्हारा दिन रो-रोकर कटता है?
यह देखो अपनी गगरी तुम आंसुओं के जल से भर रही हो।

ओ बेदरदी, तुम्हारे उन रंगो पांवों पर मामला बनकर कौन लिपट गया?
तुम्हारे साथ कवि भी चक्कर में पड़ गया -
क्या उस माला को पापों पर पड़ा रहने दें? या गले में डालें?  आगे पढ़ें

2

6 वर्ष पहले

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