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गोरख पांडेय

काव्य चर्चा

कवि गोरख पांडेय ने बीएचयू के बारे में ये कहा था...

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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चैन की बाँसुरी बजाइये आप
शहर जलता है और गाइये आप
हैं तटस्थ या कि आप नीरो हैं
असली सूरत ज़रा दिखाइये आप 


गोरख पांडेय ने अपनी डायरी में 18 मार्च 1976 में लिखा था,  "मैं बनारस तत्काल छोड़ देना चाहता हूं। तत्काल ! मैं यहां से बुरी तरह ऊब गया हूं। विभाग, लंका, छात्रावास लड़कियों पर बेहूदा बातें। राजनीतिक मसखरी। हमारा हाल बिगड़े छोकरों सा हो गया है। लेकिन क्या फिर हमें ख़ासकर मुझे जीवन के प्रति पूरी लगन से सक्रिय नहीं होना चाहिए? ज़रूर कभी भी शुरू किया जा सकता है। दिल्ली में अगर मित्रों ने सहारा दिया तो हमें चल देना चाहिए। मैं यहां से हटना चाहता हूं। बनारस से कहीं और भाग जाना चाहता हूं।"

गोरख पांडेय के समय की अपनी परिस्थितियां रही होंगी लेकिन आज बनारस उबल रहा है और इस उबाल के केंद्र में लड़कियां हैं। मेरे विषय के केंद्र में गोरख और उनकी रचनात्मकता है लेकिन चूँकि गोरख का भी सम्बन्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से रहा है इसलिए वो अपनी रचनात्मकता या उससे इतर विश्वविद्यालय की परिस्थितियों पर क्या सोच रहे थे, ये डायरी उसकी एक झलक पेश करती है। गोरख ने भी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ही शिक्षा ग्रहण की थी, हालाँकि एक समय के बाद वहां उनका मन नहीं लगा तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय चले आए।
  
बहरहाल उस गहराई में यहां नहीं उतरना है। हाँ, उस बहाने गोरख और उनकी कुछ रचनाओं को आप तक पहुंचाने का प्रयास जरूर करेंगे। गोरख पांडेय का जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के पंडित के मुड़ेरवा गांव में सन् 1945 में हुआ था। उनका किसान आन्दोलन से प्रत्यक्ष जुड़ाव रहा। उनकी कविताएं हर तरह के शोषण से मुक्त दुनिया के लिए आवाज उठाती रहीं। गोरख के अंदर का कवि ही नहीं उनके अंदर का इंसान भी क्रांतिकारी प्रवृत्ति का था। शोषित-दमित वर्ग के लिए उनके मन में जो था वो उनकी कविताओं में साफ़ दिखता है। सत्ता से हर कदम टकराने और मजदूरों के हक़ में खड़े रहने माद्दा उनमें कूट-कूटकर भरा था - 

हज़ार साल पुराना है उनका गुस्सा
हज़ार साल पुरानी है उनकी नफरत
मैं तो सिर्फ
उनके बिखरे हुए शब्दों को
लय और तुक के साथ 
लौटा रहा हूँ
मगर तुम्हें डर है कि
आग भड़का रहा हूँ। 


अपने वैचारिक मूल्यों के प्रति दीवानगी के हद समर्पण गोरख को और कवियों से अलग करती है। उनके अंदर भी एक उमड़-घुमड़ चल रहा था और इसी ने उन्हें कवि बनाया। उन्होंने किसानों-मजदूरों के आन्दोलनों में हिस्सा लिया और इन्हीं आन्दोलनों ने उन्हें कवि बनाया। गोरख ने अपने कवि होने की संवेदनशीलता को अपने डायरी में दर्ज करते हुए लिखा, 

"कविता और प्रेम – दो ऐसी चीजें हैं जहाँ मनुष्य होने का मुझे बोध होता है। 'प्रेम' मुझे समाज से मिलता है और समाज को कविता देता हूँ। क्योंकि मेरे जीने की पहली शर्त भोजन, कपड़ा और मकान मजदूर वर्ग पूरा करता है और क्योंकि इसी तथ्य को झुठलाने के लिये तमाम बुर्जुआ लेखन चल रहा है, क्योंकि मजदूर वर्ग अपने हितों के लिये जगह जगह संघर्ष में उतर रहा है, क्योंकि मैं उस संघर्ष में योगदान देकर ही अपने जीने का औचित्य साबित कर सकता हूँ। इसलिये कविता मजदूर वर्ग और उसके मित्र वर्गों के लिये ही लिखता हूँ। कविता लिखना कोई बड़ा काम नहीं मगर बटन लगाना भी बड़ा काम नहीं। हाँ, उसके बिना पैंट कमीज बेकार होते हैं।" 

गोरख हमेशा आंदोलित होते रहते हैं, सत्ता से मुठभेड़ भी करते हैं लेकिन साथ में उम्मीद के गीत भी लिखते हैं - 

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे
गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे
सूरज झोपड़ियों में चमकेगा
बच्चे सब दूध में नहाएंगे।

जालिम के पुर्जे उड़ जाएंगे
मिल-जुल के प्यार सभी गाएंगे
मेहनत के फूल उगाने वाले    
दुनिया के मालिक बन जाएंगे।

दुख की रेखाएं मिट जाएंगी
खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे
सपनों की सतरंगी डोरी पर
मुक्ति के फरहरे लहराएंगे। 
 

भोजपुरी में गोरख ने कई गीत और कवितायें लिखीं। उनके क्रांतिकारी गीतों को जगह-जगह मजदूर-किसान और छात्र आंदोलनों में गाया जाता रहा है - 
 
झकझोर दुनिया हो झकझोर दुनिया 
जनता की चले पलटनियां
हिल्ले ले झकझोर दुनिया। 

हिल्ले ले पहड़वा
हिल्ले ले नदी तलवा 
सगरे में उठे रे हिलोरवा 
हिल्ले ले झकझोर दुनिया। 
 

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समझौता, न ही रचनाओं में, ना ही व्यक्तित्व में

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