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famous writer Krishna sobti Novel Gujarat Pakistan to Gujarat Hindustan

काव्य चर्चा

अपने-अपने घरों से फेंके गए वजूद

कन्नौज से प्रियंका रघुवंशी

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कर्जन रोड पर दो-एक कारें खामोशी को समेटते हुए, यह जा और वह जा। सोचा घर का दरवाजा तो खुला न होगा। चुपचाप नौब घुमाने से भी चलेगा नहीं। कांच पर हौले से आवाज करने से शायद जगदीश भाई दरवाजा खोल दें। ऐसा न हुआ, तो संबंधियों की भीड़ उसके पीछे पड़ जाएगी। कोई-न-कोई जरूर उस पर बोलेगा-'अरी! इस गदरी वक्त में कहां घूम रही थी? दफा करो अपने इन हमसायों को।’ उसने चुपीती आंखों से कुरेशी अंकल के दरवाजे की ओर देखा। हमारे लिए वह हमेशा को बंद हो चुके। देश का बंटवारा और आजादी एक साथ। अपने बरामदे में पांव रखते ही रफ्तार में कुछ ऐसी खींच पड़ी ज्यों किसी हमले का सामना करना हो।

दरवाजा खटखटाना नहीं पड़ा। भिड़ा था और बाहर किसी की थकी-हारी बदरंग पेशोरी जूतियां पड़ी थीं। तो एक और कोई अपनी संबंधी, अपने ही वतन से भागा हुआ जख्मी घायल। जाने कैसा हिसाब बना- कोई यहां से गया और कोई वहां से आया। राहों में मार-काट, दीवानगी- यहां से रवानगी तो वह गए, वहां से पीठ तो कुछ यहां पहुंचे, कुछ रास्ते में ही...

मरजाई चक वाले मामा ने खट्टी आवाज के बोल उस पर बुहार दिए। काकी अब किसे रुखसत कर आईं- अरी हम अंदर-ही-अंदर घुख मर रहे हैं और तुम अब भी सरकारी मुंह-मुलाहजों पर हो। राख डालो गोरी सरकार और अपने डराकल लीडरों पर जिन्होंने मुसलमानों को पहले सिखाया-पढ़ाया था, फिर अपने वतन की चीर-फाड़ कर दी। वह जवाब में कुछ कहे-न-कहे कि मामा आंखें मूंद फिर अपने अंदर हो गए। हारे हुए यह सब और उनके बुचके, पोटलियां, बदरंग पुरानी संदूकचियां, गठरियां, मैले-अधमैले दुपट्टे, चेहरे-पिटी हुई नफरत से तपते हुए- कोई ठंडी हुई खूंखार नफरत से निढाल, कोई जवान बेटे के बिछुड़े चेहरे के साथ सटा, कोई बेटी के रांगले चूड़ों पर सलाखों को गोंदते हुए- हाय ओ रब्बा- उसकी बांहें- कोई पीछे छूट गए बूढ़े मां-बाप को याद करता- घरों को पागलखान बना दिया सियासत ने। सारा शहर भरा है अपने-अपने घरों से फेंके गए वजूदों से।

साभार: अभियान डेस्क, अमर उजाला
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