बहादुर शाह ज़फर हिंदुस्तान में मुग़लिया सल्तनत के आख़िरी बादशाह थे। स्वाभाविक है कि किसी भी बादशाह को अपनी ज़मीन से मुहब्बत होती हो और उसकी रक्षा के लिए उसे कई-कई बार युद्ध भी करने पड़ते हैं। बहादुर शाह ने भी अंग्रेज़ों के विरूद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम किया जिसमें उनकी हार के बाद उन्हें बंदी बना लिया गया।
एक बादशाह को ऐसे युद्ध के लिए जितना कठोर होना पड़ता है एक शायर को शायरी कहने के लिए उतना ही कोमल होना पड़ता है। लेकिन ज़फ़र दोनों के ही संयोग से बने व्यक्ति थे। उन्होंने लड़ाईयां लड़ीं तो शायरी भी कहीं। उनके शब्दों में रूमानियत है तो अपनी ज़मीन के लिए मुहब्बत भी। पढ़ें आख़िरी मुग़ल बादशाह के ये अल्फ़ाज़
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़-दार में
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