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आलोक धन्वा

काव्य चर्चा

तरासी हुई अभिव्यक्ति के कवि आलोक धन्वा और उनकी कविताएं

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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आलोक धन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तरासी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है, जिसमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है। कविता में उनके विचार जितने सशक्त हैं, भाषा उतनी ही सरल है। कविता आसानी से लोगों के समझ में आ सकती है। उनके रचना संसार में इनसानी सरोकार के साथ-साथ हवा, पानी, रेलवे, पशु-पक्षी, चांद-तारे तक शामिल हैं। 

उनका पहला संग्रह है- दुनिया रोज बनती है। ’जनता का आदमी’, ’गोली दागो पोस्टर’, ’कपड़े के जूते’ और ’ब्रूनों की बेटियाँ’ हिन्दी की प्रसिद्ध कविताएँ हैं। अंग्रेज़ी और रूसी में कविताओं के अनुवाद हुये हैं। उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान मिले हैं।  

तुम एक पिछड़े हुए वक्ता हो 

तुम एक ऐसे विरोध की भाषा में बोलते हो 
जैसे राजाओं का विरोध कर रहे हो 
एक ऐसे समय की भाषा जब संसद का जन्म नहीं हुआ था 
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यह राजा नहीं जिलाधीश है !

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