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Trilochan Poetry: चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती

कविता
                
                                                         
                            चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती 
                                                                 
                            
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है 
खड़ी-खड़ी चुपचाप सुना करती है 
उसे बड़ा अचरज होता है : 
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर 
निकला करते हैं 

चंपा सुंदर की लड़की है 
सुंदर ग्वाला है : गायें-भैंसे रखता है 
चंपा चौपायों को लेकर 
चरवाही करने जाती है 

चंपा अच्छी है 
चंचल है 
न ट ख ट भी है 
कभी-कभी ऊधम करती है 
कभी-कभी वह क़लम चुरा देती है 
जैसे तैसे उसे ढूँढ़ कर जब लाता हूँ 
पाता हूँ—अब काग़ज़ ग़ायब 
परेशान फिर हो जाता हूँ 

चंपा कहती है : 
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर 
क्या यह काम बहुत अच्छा है 
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ 
फिर चंपा चुप हो जाती है  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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