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हे ! मजदूरों ,तुम्हें नमन: सतीश उपाध्याय

हे ! मजदूरों ,तुम्हें नमन: सतीश उपाध्याय
                
                                                         
                            जो धरती की माटी  लेकर
                                                                 
                            
 माथे तिलक लगाते हैं

जो खेतों से राजपथों तक
 श्रम के गीत सुनाते हैं ।

जिनके भीतर जलती रहती 
सूरज जैसी कोई अगन

 हे! मजदूरों तुम्हें नमन
 हे! श्रमवीरों तुम्हें नमन।

 जिनका स्वेद, गिरे धरा पर
 वो चंदन बन जाता है।

 चट्टानों को काट काट 
जो गीत विजय के गाता है 

संघर्षों में  तपकर भी
 अंदर जिंदा रखे लगन

 हे! मजदूरों   तुम्हें नमन 
हे! श्रमवीरों  तुम्हें नमन।
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5 वर्ष पहले

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