एक
नहीं नहीं प्रभु तुमसे
शक्ति नहीं माँगूँगा।
अर्जित करूँगा उसे मरकर बिखरकर
आज नहीं कल सही आऊँगा उबरकर
कुचल भी गया तो लज्जा किस बात की
रोकूँगा पहाड़ गिरता
शरण नहीं भागूँगा
नहीं नहीं प्रभु तुमसे
शक्ति नहीं माँगूँगा।
कब माँगी गंध तुमसे गंधहीन फूल ने
कब माँगी कोमलता तीखे खिंचे शूल ने
तुमने जो दिया, दिया,
अब जो है, मेरा है।
सोओ तुम, व्यथा रैन अब मैं ही जागूँगा।
नहीं नहीं प्रभु तुमसे
शक्ति नहीं माँगूँगा।
दो
दुर्गम पथ तेरे हों
थके चरण मेरे हों
यात्रा में साथी हों हर पल असफलताएँ
मुझ पर गिरती जाएँ मेरी ही सीमाएँ
सुखद दृश्य तेरे हों
भरे नयन मेरे हों।
दुर्गम पथ तेरे हों
थके चरण मेरे हों।
अपने साहस को भी मैं कंधों पर लादे
चलता जाऊँ जब तक तू यह तन पिघला दे
अमर सृजन तेरे हों
मृत्यु वरण मेरे हों
दुर्गम पथ तेरे हों
थके चरण मेरे हों।
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