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रामधारी सिंह दिनकर के कुरुक्षेत्र से चुनिंदा अंश 

कविता
                
                                                         
                            युद्ध निंदित है और उसका दायित्व किस पर होगा? जो अनीतियों का जाल बिछाकर प्रतिकार को आमंत्रण देता है, उस पर? या उस पर जो जाल को छिन्न-भिन्न करने के लिए लालायित रहता है। दिनकर के काव्य कुरुक्षेत्र में कुछ ऐसी ही बातों पर विचार किया गया है। मनुष्य का धर्म है कर्म करते रहना, इसी की व्याख्या दिनकर करते हैं। प्रस्तुत है कुरुक्षेत्र से यह अंश- 
                                                                 
                            

वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहू का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्यवहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष[1] है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की?

और तब सम्मान से जाते गिने
नाम उनके, देश-मुख की लालिमा
है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;
देश की इज्जत बचाने के लिए
या चढा जिसने दिये निज लाल हैं। आगे पढ़ें

एक वर्ष पहले

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