अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तमाम ख़ाना-ब-दोशों में मुश्तरक है ये बात
सब अपने अपने घरों को पलट के देखते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
कब आओगे ये घर ने मुझ से चलते वक़्त पूछा था
यही आवाज़ अब तक गूँजती है मेरे कानों में
- कफ़ील आज़र अमरोहवी
उन दिनों घर से अजब रिश्ता था
सारे दरवाज़े गले लगते थे
- मोहम्मद अल्वी
जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में
यक़ीन मानो पुरानी रुत के गुलाब रक्खे हुए हैं घर में
- मोहम्मद मुबशशिर मेयो
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
- अहमद फ़राज़
दिल तो मेरा उदास है 'नासिर'
शहर क्यूँ साएँ साएँ करता है
- नासिर काज़मी
Urdu Poetry: ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं