मुज़फ़्फ़रपुर की मासूम लड़कियां
दिल्ली की दुरभिसंधियाँ नही जानतीं।
उनमें होती है एक अनंत रागिनी
एक प्रतीक्षित संगिनी।
कभी लगतीं चिर वियोगिनी
उनकी कविता पढ़ कर लगता
ज़रूर ये प्रेम में छली गयी लड़कियां हैं।
कभी लगता ये अधखुली खिड़कियां हैं
जबकि उनके प्रेम कभी पंचम सुर लगा ही न पाए
कभी प्रेमी डरपोक निकले ,
कभी ये झिझक में ठिठक गयीं।
वैसे ये अपना मन पूरा उंडेल देतीं
बात में,दवात में,मुलाकात में।
कोई इन्हें रोकता या टोकता
ये बदली की तरह बरस जातीं
या बिजली की तरह कड़कड़ा जातीं।
मुज़फ़्फ़रपुर की मासूम लड़कियां
दिल्ली की बेदिल फिज़ा में
सगेपन को तरस जातीं।
लेकिन इन्हीं लड़कियों ने जब उठायी कलम
ये झरने सी बहने लगीं
गुपचुप नहीं खुलेआम कहने लगीं
"हमें रुकना नहीं आता
झुकना नहीं आता।
अपनी राह चलेंगी, टोक कर देखो हमें"
मौलिकता का मौसम बदल दिया
मुज़फ़्फ़रपुर की मासूम लड़कियों ने।
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