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महादेवी वर्मा की कविता: तुम दुख बन इस पथ से आना !

कविता
                
                                                         
                            तुम दुख बन इस पथ से आना!
                                                                 
                            

शूलों में नित मृदु पाटल-सा;
खिलने देना मेरा जीवन;

क्या हार बनेगा वह जिसने
सीखा न हृदय को बिंधवाना!

वह सौरभ हूँ मैं जो उड़कर
कलिका में लौट नहीं पाता,

पर कलिका के नाते ही प्रिय
जिसको जग ने सौरभ जाना!

नित जलता रहने दो तिल तिल,
अपनी ज्वाला में उर मेरा;

इसकी विभूति में फिर आकर
अपने पद-चिह्न बना जाना!

वर देते हो तो कर दो ना,
चिर आँखमिचौनी यह अपनी;

जीवन में खोज तुम्हारी है
मिटना ही तुमको छू पाना!

प्रिय! तेरे उर में जग जावे,
प्रतिध्वनि जब मेरे पी पी की;

उसको जग समझे बादल में
विद्युत का बन बन मिट जाना!

तुम चुपके से आ बस जाओ,
सुख-दुख सपनों में श्वासों में;

पर मन कह देगा ‘यह वे हैं’
आँखें कह देंगी ‘पहचाना’!

जड़ जग के अणुओं में स्मित से,
तुमने प्रिय जब डाला जीवन,

मेरी आँखों ने सींच उन्हें
सिखलाया हँसना खिल जाना!

कुहरा जैसे घन आतप में,
यह संसृति मुझमें लय होगी;

अपने रागों में लघु वीणा
मेरी मत आज जगा जाना!

तुम दुख बन इस पथ से आना!

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एक वर्ष पहले

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