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Maha kumbh prayagraj 2025: ओम निश्चल की कविता- लगा कुंभ मेला

कविता
                
                                                         
                            लगा कुंभ मेला 
                                                                 
                            
लगा कुंभ मेला।

ये धरती है यज्ञों की संगम की धरती 
यम औ नियम और संयम की धरती
यहीं आके योगी यती ध्यान करते 
सुबह गंगा जमुना में हैं स्नान करते

यहां पर न जाने हैं कितने अखाड़े 
भभूती  रमाए  और  झंडा हैं गाड़े
यहां कीर्तन  और भजन गूंजते हैं 
वक्ता   प्रवक्ता   सभी   कूकते  हैं

यहां पर विविध भांति होता है खेला 
लगा कुंभ मेला लगा कुंभ मेला। 

टेम्पो से आए औ बस से हैं आए
तो कुछ गांव से चलके पैदल हैंआए
जटा जूट में कितने दिखते हैं साधु
तो मिलते हैं कितने यहां सर मुड़ाए

यहां तंबुओं  बंबुओं  की  कतारें 
यहां सज्जनों साधुओं की कतारें 
महावत के अंकुश में ही दिखती हैं 
थिरकती हुई हाथियों की कतारें

न समझे कोई खुद यहां पर अकेला
लगा कुंभ  मेला  लगा कुंभ मेला।
 

राशन औ पानी लिए कांधे कांधे 
चले  आ रहे  हैं  किए  राधे राधे
हैं जाड़े के दिन तो रजाई औ कंबल
इसी को समझिए है जीने का संबल

यहां अम्मा बाबू यहां चाचा चाची
सभी आ गए हैं यहां  कल्पवासी 
धरम की करम की ये है जिंदगानी 
भला कुंभ की किसने महिमा है जानी

बहुत धक्का धुक्की बहुत ठेली ठेला 
लगा कुंभ मेला लगा कुंभ मेला।

है अस्नान का दिन परम पुण्य पावन 
तो फिर डुबकियों की है महिमा सुहावन
हर हर  महादेव  जय गंगा मइया 
वही जिंदगी की है सबकी खेवइया

उसी की कृपा हो तो कुदरत ये बोले 
धरम औ करम की ये नौका भी डोले
वहीं चाह ले तो मनुजता की जय हो 
अगर ठान ले तो पवन भी न डोले

है क्या जिंदगी जैसे माटी का ढेला
लगा कुंभ मेला लगा कुंभ मेला।

उठो,धर्म का जैसे रथ सज चुका है 
यहां कुंभ का एक नगर बस चुका है 
कभी वह न भूलेगा सुख जिंदगी का 
जो मेले का एक बार रस चख चुका है

सभी स्नान की ओर उन्मुख हैं देखो 
भजन ध्यान की ओर उन्मुख हैं देखो 
पंडे  पुजारी  सभी  जग  गए  हैं 
सभी ज्ञान की ओर उन्मुख हैं देखो 

कितनी सुहानी है यह ब्रह्म वेला 
लगा कुंभ मेला लगा कुंभ मेला।

ये मेला है भइया यहां बिन बुलाए 
बहुत दूर से लोग श्रद्धा से आए 
न चिट्ठी न पत्री न फोन औ मोबाइल
टिकट खुद करा के खुले मन से आए

ये जनता है भोली ये त्यागी तपस्वी 
इसे चाहे कह लो मनस्वी मनस्वी
इसे है न आता तिया और पांचा 
हिया इसका सचमुच है हीरे सा सांचा

गुरू है किसी की किसी का न चेला।
लगा कुंभ मेला लगा कुंभ मेला।


 
एक वर्ष पहले

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