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गोपालदास नीरज: चुनिंदा मुक्तक, गीत और कविताएं

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                            आह वह रूप
                                                                 
                            

आह वह रूप, वह यौवन, वह निरी शोख़ छटा,
जिसने देखी न, तेरे दर से वो फिर दूर हटा,
गोरे मुखड़े पे वो बिखरी हुई बालों की लटें
चाँद को जैसे लिए गोद हो सावन की घटा 

जहाँ मैं हूँ

जहां मैं हूं वहां उम्मीद पैहम टूट जाती है
जवानी हाथ मल-मलकर वहां आंसू बहाती है
चमन हैं, फूल हैं, कलियां हैं, ख़ूशबू भी है रंगत भी
मगर आकर वहाँ बुलबुल तराने भूल जाती है 
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जहाँ मैं हूँ

4 वर्ष पहले

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