आह वह रूप
आह वह रूप, वह यौवन, वह निरी शोख़ छटा,
जिसने देखी न, तेरे दर से वो फिर दूर हटा,
गोरे मुखड़े पे वो बिखरी हुई बालों की लटें
चाँद को जैसे लिए गोद हो सावन की घटा
जहां मैं हूं वहां उम्मीद पैहम टूट जाती है
जवानी हाथ मल-मलकर वहां आंसू बहाती है
चमन हैं, फूल हैं, कलियां हैं, ख़ूशबू भी है रंगत भी
मगर आकर वहाँ बुलबुल तराने भूल जाती है
था कण्ठ अपना ही बेसुरा, तार तो कोई बेसुरा न देखा,
थी शक्ल अपनी ही नक्ल, शीशा तो कोई खोटा-खरा न देखा,
न दोष तुमको, न दोष हमको, यह अपनी-अपनी नज़र है भाई!
कि तुमने कोई भला न देखा, कि हमने कोई बुरा न देखा!
काल बादलों से घुल जाए, यह मेरा इतिहास नहीं है!
काल बादलों से घुल जाए, यह मेरा इतिहास नहीं है!
गायक जग मैं कौन गीत जो मुझ-सा गाए,
मैंने तो केवल हैं ऐसे गीत बनाए,
कंठ नहीं जिनक गाती हैं पलकें गीली,
स्वर-सम जिनका अश्रु मोतिया हास नहीं है!
मुझसे ज़्यादा मस्त जगत में मस्ती जिसकी,
और अधिक आज़ाद अछूती हस्ती जिसकी,
मेरी बुलबुल चहका करती उस बगिया में,
जहाँ सदा पतझर आता मधुमास नहीं है!
किस मे इतनी शक्ति साथ जो कदम धर सके,
गति न पवन की भी जो मुझसे होड़ कर सके,
मैं ऐसे पथ का पंथी हूं जिसको क्षण भर,
मंज़िल पर भी रुकने का अवकाश नहीं है!
कौन विश्व में है जिसका मुझसे सर ऊँचा?
अभ्रंकष यह तुंग हिमालय भी तो नीचा,
क्योंकि खुले हैं मेरे लोचन उस दुनिया में,
जहाँ धरा तो है लेकिन आकाश नहीं है।
जग रूठे तो बात न कोई तुम रूठे तो प्यार न होगा
जग रूठे तो बात न कोई
तुम रूठे तो प्यार न होगा।
मणियों में तुम ही तो कौस्तुभ
तारों में तुम ही तो चन्दा,
नदियों में तुम ही तो गंगा
गन्धों में तुम ही निशिगन्धा,
दीपक में जैसे लौ-बाती,
तुम प्राणों के संग-संगाती,
तन बिछुड़े तो बात न कोई
तुम बिछुड़े सिंगार न होगा।
व्योम नहीं यह, भाल तुम्हारा
धरा नहीं है धूल चरण की,
सृष्टि नहीं यह लीला केवल-
सृजन-प्रलय की प्रलय-सृजन की,
तन का, मन का, जग-जीवन का
तुमसे ही नाता इन-उन का,
हम न रहें तो बात न कोई
तुम न रहे संसार न होगा।
पूनम गौर कपोल बिराजे
अधर हँसें ऊषा अरुणीली,
कुन्तल-लट से लिपटी संध्या
श्यामा अंजन-रेख नशीली,
सरि-सागर, दिशि भू-अम्बर
तुमसे ही द्युतिमान चराचर,
रवि न उगे तो बात न कोई
तुम न उगे उजियार न होगा।
तुम बोले संगीत जी गया,
तुम चुप हुए, हुई चुप वाणी,
तुम विहँसे मधुमास हँस उठा,
तुम रोये रो उठा हिमानी,
जन्म विरह-दिन, मरण मिलन-क्षण,
तुम ही दोनों पर्व चिरन्तन,
दृग न दिखें तो बात न कोई,
तुम न दिखे दरबार न होगा !
तुमसे लागी प्रीति, बिना-
भाँवर दुलहिन हो गई सुहागिन,
तुमसे हुआ विछोह, मृत्तिका-
की वन्दिन हो गई अनादिन,
निपट-बिचारी, निपट-दुखारी,
बिना तुम्हारे राजकुमारी,
मुक्ति न मिले, न कोई चिन्ता,
तुम न मिले भव पार न होगा।
जग रूठे तो बात न कोई,
तुम रूठे तो प्यार न होगा।
कविता एक चिड़िया है
जो अपना घोंसला तो
पेड़ की ऊंची से ऊंची शाख पर बनाती है
लेकिन जो अपना भोजन
धरती के गंदे से गंदे कोनों में खोजती है!
इसलिए,
हे संसार के महापुरुषो!
कविता मत करो-
क्योंकि सृजन के लिए
उसके साथ
तुम्हें भी ज़मीन की गंदगियों में उतरना पड़ेगा।
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जहाँ मैं हूँ
4 वर्ष पहले
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