फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !
बाग़ है ये, हर तरह की वायु का इसमें गमन है,
एक मलयज की वधू तो एक आँधी की बहन है,
यह नहीं मुमकिन कि मधुऋतु देख तू पतझर न देखे,
कीमती कितनी कि चादर हो पड़ी सब पर शिकन है,
दो बरन के सूत की माला प्रकृति है, किन्तु फिर भी-
एक कोना है जहाँ श्रृंगार सबका है बराबर !
फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !
कोस मत उस रात को जो पी गई घर का सबेरा,
रूठ मत उस स्वप्न से जो हो सका जग में न तेरा,
खीज मत उस वक्त पर, दे दोष मत उन बिजलियों को-
जो गिरीं तब-तब कि जब-जब तू चला करने बसेरा,
सृष्टि है शतरंज औ’ हैं हम सभी मोहरे यहाँ पर
शाह हो पैदल कि शह पर वार सबका है बराबर !
फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !
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