मैं फिर जनम लूँगा
फिर मैं
इसी जगह आऊँगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को
बाँहों में उठाऊँगा ।
मैं फिर जनम लूँगा
फिर मैं
इसी जगह आऊँगा...
इस समूह में
इन अनगिनत अनचीन्ही आवाज़ों में
कैसा दर्द है
कोई नहीं सुनता !
पर इन आवाज़ों को
और इन कराहों को
दुनिया सुने, मैं ये चाहूँगा !
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