जब तुम्हें लिखकर भी भूल नहीं पाऊँगा।
तो... चुप हो जाऊँगा।
इस प्रेत-मठ के जंगलों पर नहीं लटकाऊँगा तुम्हें
तुम्हारी हड्डियों में सूराख़ कर फूल-मालाएँ पिन्हाऊँगा नहीं।
सीढ़ियों पर से आवाज़ नहीं दूँगा
गहरी नींद से जगाऊँगा नहीं;
परिचित दीवारों को छू कर
लौट आऊँगा।
खुले चौराहों, अधखुली ऋतुओं या काँपते मकानों
औंधी किताबों या सपने बहाती नदियों की काली-काली धाराओं
ख़ून को तलाशती हवाओं
या घन होती संध्या-रेती के बीच
तुम्हारी आहट पकड़ कर
टटोलूँगा नहीं!
बारिश में झरे हुए फूल, हरे रंग, बीते आकाश की फुहार
पीले वसन में निर्वसन कोई धूप-रूप, एकत्र नहीं करूँगा,
तुम्हारे कानों में गुनगुनाया हुआ कोई गीत—फिर,
फिर गुनगुनाता, सड़कों का अंत नहीं करूँगा;
एकाकी दुपहर के दुःख से तिलमिला
हरी-हरी घास में मुँह डाल धरती—माँ से कुछ कहूँगा नहीं।
निर्णय भी किसी से माँगूँगा नहीं
उसे भी तुम्हीं पर छोड़—फिर
किसी वन की सीमा-रेखा पर
पतझर के झर-झर भोर में देखूँगा
सदाबहार वृक्षों से चिड़ियों का उड़ते जाना... उड़ते जाना...
उड़ते जाना
जब तुम्हें लिखकर भी मेरे कवि!
भूल नहीं पाऊँगा।
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