आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दूधनाथ सिंह की कविता- परिचित दीवारों को छू कर लौट आऊँगा

कविता
                
                                                         
                            जब तुम्हें लिखकर भी भूल नहीं पाऊँगा।
                                                                 
                            
तो... चुप हो जाऊँगा।

इस प्रेत-मठ के जंगलों पर नहीं लटकाऊँगा तुम्हें
तुम्हारी हड्डियों में सूराख़ कर फूल-मालाएँ पिन्हाऊँगा नहीं।
सीढ़ियों पर से आवाज़ नहीं दूँगा
गहरी नींद से जगाऊँगा नहीं;
परिचित दीवारों को छू कर
लौट आऊँगा।

खुले चौराहों, अधखुली ऋतुओं या काँपते मकानों
औंधी किताबों या सपने बहाती नदियों की काली-काली धाराओं
ख़ून को तलाशती हवाओं
या घन होती संध्या-रेती के बीच
तुम्हारी आहट पकड़ कर
टटोलूँगा नहीं!

बारिश में झरे हुए फूल, हरे रंग, बीते आकाश की फुहार
पीले वसन में निर्वसन कोई धूप-रूप, एकत्र नहीं करूँगा,
तुम्हारे कानों में गुनगुनाया हुआ कोई गीत—फिर,
फिर गुनगुनाता, सड़कों का अंत नहीं करूँगा;
एकाकी दुपहर के दुःख से तिलमिला
हरी-हरी घास में मुँह डाल धरती—माँ से कुछ कहूँगा नहीं।

निर्णय भी किसी से माँगूँगा नहीं
उसे भी तुम्हीं पर छोड़—फिर
किसी वन की सीमा-रेखा पर
पतझर के झर-झर भोर में देखूँगा
सदाबहार वृक्षों से चिड़ियों का उड़ते जाना... उड़ते जाना...
उड़ते जाना

जब तुम्हें लिखकर भी मेरे कवि!
भूल नहीं पाऊँगा।

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 


 
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर