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'रोज डे' पर मन को छू लेने वाली 'नीरज' की कविता- दो गुलाब के फूल छू गए...

'रोज डे' पर मन को छू लेने वाली 'नीरज' की कविता- दो गुलाब के फूल छू गए
                
                                                         
                            दो गुलाब के फूल छू गए जब से होंठ अपावन मेरे
                                                                 
                            
ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है।

रोम-रोम में खिले चमेली
साँस-साँस में महके बेला,
पोर-पोर से झरे मालती
अंग-अंग जुड़े जुही का मेला
पग-पग लहरे मानसरोवर, डगर-डगर छाया कदम्ब की
तुम जब से मिल गए उमर का खंडहर राजभवन लगता है।
दो गुलाब के फूल...

छिन-छिन ऐसा लगे कि कोई
बिना रंग के खेले होली,
यूँ मदमाएँ प्राण कि जैसे
नई बहू की चंदन डोली
जेठ लगे सावन मनभावन और दुपहरी सांझ बसंती
ऐसा मौसम फिरा धूल का ढेला एक रतन लगता है।
दो गुलाब के फूल...
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7 वर्ष पहले

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