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'कृष्ण की चेतावनी' के बाद क्या था 'रश्मिरथी' में अगला दृश्य

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भगवान सभा को छोड़ चले,
करके रण गर्जन घोर चले
सामने कर्ण सकुचाया सा,
आ मिला चकित भरमाया सा
हरि बड़े प्रेम से कर धर कर,
ले चढ़े उसे अपने रथ पर

रथ चला परस्पर बात चली,
शम-दम की टेढ़ी घात चली,
शीतल हो हरि ने कहा, "हाय,
अब शेष नहीं कोई उपाय
हो विवश हमें धनु धरना है,
क्षत्रिय समूह को मरना है

मैंने कितना कुछ कहा नहीं?
विष-व्यंग कहां तक सहा नहीं?
पर, दुर्योधन मतवाला है,
कुछ नहीं समझने वाला है
चाहिए उसे बस रण केवल,
सारी धरती कि मरण केवल

हे वीर! तुम्हीं बोलो अकाम,
क्या वस्तु बड़ी थी पांच ग्राम?
वह भी कौरव को भारी है,
मति गई मूढ़ की मारी है
दुर्योधन को बोधूं कैसे?
इस रण को अवरोधूं कैसे?
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6 वर्ष पहले

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