आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

'कृष्ण की चेतावनी' के बाद क्या था 'रश्मिरथी' में अगला दृश्य

ramdhari singh dinkar rashmirathi krishna ki chetavani
                
                                                         
                            
भगवान सभा को छोड़ चले,
करके रण गर्जन घोर चले
सामने कर्ण सकुचाया सा,
आ मिला चकित भरमाया सा
हरि बड़े प्रेम से कर धर कर,
ले चढ़े उसे अपने रथ पर

रथ चला परस्पर बात चली,
शम-दम की टेढ़ी घात चली,
शीतल हो हरि ने कहा, "हाय,
अब शेष नहीं कोई उपाय
हो विवश हमें धनु धरना है,
क्षत्रिय समूह को मरना है

मैंने कितना कुछ कहा नहीं?
विष-व्यंग कहां तक सहा नहीं?
पर, दुर्योधन मतवाला है,
कुछ नहीं समझने वाला है
चाहिए उसे बस रण केवल,
सारी धरती कि मरण केवल

हे वीर! तुम्हीं बोलो अकाम,
क्या वस्तु बड़ी थी पांच ग्राम?
वह भी कौरव को भारी है,
मति गई मूढ़ की मारी है
दुर्योधन को बोधूं कैसे?
इस रण को अवरोधूं कैसे?

सोचो क्या दृश्य विकट होगा,
रण में जब काल प्रकट होगा?
बाहर शोणित की तप्त धार,
भीतर विधवाओं की पुकार
निरशन, विषण्ण बिल्लायेंगे,
बच्चे अनाथ चिल्लायेंगे

चिंता है, मैं क्या और करूं?
शान्ति को छिपा किस ओट धरूं?
सब राह बंद मेरे जाने,
हां एक बात यदि तू माने,
तो शान्ति नहीं जल सकती है,
समराग्नि अभी टल सकती है

पा तुझे धन्य है दुर्योधन,
तू एकमात्र उसका जीवन
तेरे बल की है आस उसे,
तुझसे जय का विश्वास उसे
तू संग न उसका छोड़ेगा,
वह क्यों रण से मुख मोड़ेगा?

क्या अघटनीय घटना कराल?
तू पृथा-कुक्षी का प्रथम लाल,
बन सूत अनादर सहता है,
कौरव के दल में रहता है,
शर-चाप उठाये आठ प्रहार,
पांडव से लड़ने हो तत्पर
आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर