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कटरी की रुकुमिनी और उसकी माता की खंडित गद्यकथा : वीरेन डंगवाल

Viren Dangwal
                
                                                         
                            मैं थक गया हूँ
                                                                 
                            

फुसफुसाता है भोर का तारा
मैं थक गया हूँ चमकते-चमकते इस फीके पड़ते
आकाश के अकेलेपन में
गंगा के खुश्क कछार में उड़ती है रेत
गहरे काही रंग वाले चिकने तरबूजों की लदनी ढोकर
शहर की तरफ चलते चले जाते हैं हुचकते हुए ऊँट
अपनी घंटियाँ बजाते प्रात की सुशीतल हवा में

जेठ विलाप के रतजगों का महीना है
घंटियों के लिए गाँव के लोगों का प्रेम
बड़ा विस्मित करने वाला है
और घुँघरुओं के लिए भी
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5 वर्ष पहले

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