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नज़ीर की नज़्म: सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी 

raksha bandhan
                
                                                         
                            चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी 
                                                                 
                            
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी 
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी 
सलोनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी 
न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी 

अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी 

अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी 
झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी 
तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी 
उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी 
तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी
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अयाँ है अब तो राखी भी चमन भी गुल भी शबनम भी 

8 वर्ष पहले

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