बेख़्याली में
उभर आयीं थीं
काग़ज़
उनकी उंगलियों से
कुछ
बेमानी
और सपाट
लकीरें
खुली तो थीं
मेरी आंखें
लेकिन उनमें
अलगाव का साया था
पढ़ नहीं पायीं वो
काग़ज़ की लकीरों के पीछे
अपनी पारदर्शी कहानी
थमे जब आंसू
और लौटे
मेरी आंखों के सपने
तो क़ाग़ज की लकीरों का
अर्थ भी वापिस आया
लकीरों ने मुझे
दिलासा दिया
और धीमे स्वर में बोलीं-
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