आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुनव्वर राना की ग़ज़ल: वो अपना जिस्म सारा सौंप देना मेरी आँखों को 

मुनव्वर राना की ग़ज़ल: ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना
                
                                                         
                            ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना 
                                                                 
                            
मगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आप का गुलनार हो जाना 

किसी दिन मेरी रुस्वाई का ये कारन न बन जाए 
तुम्हारा शहर से जाना मिरा बीमार हो जाना 

वो अपना जिस्म सारा सौंप देना मेरी आँखों को 
मिरी पढ़ने की कोशिश आप का अख़बार हो जाना 

कभी जब आँधियाँ चलती हैं हम को याद आता है 
हवा का तेज़ चलना आप का दीवार हो जाना 

बहुत दुश्वार है मेरे लिए उस का तसव्वुर भी 
बहुत आसान है उस के लिए दुश्वार हो जाना 

किसी की याद आती है तो ये भी याद आता है 
कहीं चलने की ज़िद करना मिरा तय्यार हो जाना 
आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर