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ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत: मीर तक़ी मीर

ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत: मीर तक़ी मीर
                
                                                         
                            ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत 
                                                                 
                            
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत 

जब न तब जागह से तुम जाया किए 
हम तो अपनी ओर से आए बहुत 

दैर से सू-ए-हरम आया न टुक 
हम मिज़ाज अपना इधर लाए बहुत 
 

फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे 
पर हमें इन में तुम्हीं भाए बहुत 

गर बुका इस शोर से शब को है तो 
रोवेंगे सोने को हम-साए बहुत 
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6 वर्ष पहले

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