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पिता के प्रेम में भीगे ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव के अल्फ़ाज़, दो प्रतिनिधि ग़ज़लें  

पिता के प्रेम भीगे शायर आलोक श्रीवास्तव के अल्फ़ाज़, दो प्रतिनिधि ग़ज़लें
                
                                                         
                            धड़कते साँस लेते रुकते चलते मैंने देखा है 
                                                                 
                            
कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है 

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन है 
तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैंने देखा है 

न जाने कौन है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है 
ख़ुद अपने-आप को नींदों में चलते मैंने देखा है 

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें 
तिरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है 

बदल जाएगा सब कुछ बादलों से धूप चटख़ेगी 
बुझी आँखों में कोई ख़्वाब जलते मैंने देखा है 

मुझे मालूम है उन की दुआएँ साथ चलती हैं 
सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है 
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7 वर्ष पहले

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