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आशा पांडे ओझा की पांच लोकप्रिय राजस्थानी कवितायें

best five Rajasthani poems of Asha Pandey Ojha
                
                                                         
                            म्‍हारी गीगली
                                                                 
                            

पगलियां में गूहारिया घमकाय‘र
घर आंगणै धमचक मचावती
कदै डागळां रै माथै
कदै घर रै बारणै
तुळसी सींचती
दैव आल्यां दीवला जोवती
जद कदै भीज जांवती
म्हारी आंख्यां
मुळक -मुळक निचोंवती
फिरती- घिरती जाणै कद
निपटाय देवती
घर बारणां रा सगळा काम
कदै म्हारी मा बण हुकम झाड़ती
मा थूं कर आराम
छिण-छिण
लाड रै झिकोळा में
झिकोळी इणनै
हर दीठ-कुदीठ सूं
राखी लुकाय-लुकाय
घणी लाडां-कोडां सूं
पाळी इणनै
आज पूरी पंदरा बरसां री
हुगी म्हारी गीगली
आगला कीं बरसां मां
परणा उणनै
अर करणी पड़सी पराई
काळजौ सात हाथ बारणै आग्यो
फगत इण बीचार भर सूं
ढाबियोड़ा नीं ढब रिया
आंख्यां रा बादळ।

रतेलियो 

सूख्योड़ी लकड़ियां रै जेड़ा
चर ‘र-चर ‘र करता थकां हाडका
सूख ‘र पाका पड़ियोड़ा खजूर री
पाकी पड़योड़ी पत्तियां जैड़ी
ही उणरै मुंडा री झिरियां
बिरखा में
छैटी-छुटियोड़ी छीणा रै
बीचाकर टिपकता पाणी
सीरखी टिपक-टिपक टिपकती थकी आंखियां
अर उण रै में फोड़ा रै मवाद सो
भैळो हुयौड़ो पीळौ-पीळौ मैल
भीज-भीज ‘र पाछी सूख्यिोड़ी
धूड़-धूसरित भींता जैड़ी
झड़-झड़ झड़ती काळा कट
होंठां माथली पापड़ी
कीणी मोटर रै हैठै आय ‘र
पिचकीजियोड़ी रबड़ री
सीसी सरीसी कुड़सी रै हथा सरीसी
अठी उठी माडांई हिलता डुलता उण रा हाथ
पुराणा ढोलिया रै पागां जैड़ा
डिग-मिग, डिग-मिग करता थकां पगल्यां
रासण रै चावळा जैड़ा
धोळा, पीळा गूबळा उणरा केस
कोई बरसां बरस पैली
खेत री रूखाल सारू
बणाया थकां अड़वा रै
गाबां सरीसो हो उणरौ पैराण
बात-बात में हंसतोै थकौ
भीजोय लैंवती आंख्यां
मियाद बारै हुयोड़ी
सेवन सीज री गोळियां सरीसा
हा उणरा केसरिया कट दांत
बुइियोडा मुंडा माथै
लरेक घड़ी झुपती बीड़ी
इयांन लागती
जाणै कोई निपट अमावस री
काळी सूनी रात में
झपझपाय रियो एकलो मंगळ तारो
बीस रूपिया मइना पर घर हिसाब सूं
करण आवतो हो बो
म्हाणै गवाड़ री रूखाली
राम जाणै कुण करतो हुसी
उण गरीब री रूखाळी
कोई तीस बरसां पछै
आज क्या आय उबियौ
म्हारी आंख्यां आगै
रतैलियो।

कैड़ा जबरा मिनख हो थें 

जद सूं थे गया हो बिदेश
मन रै आंगणै
आंसूड़ा बांध ली है आपरी ढाण
दरद ई कद कौ बैठियौ है
ढोलियो ढाळ
पग पसार बैठी है
आ बैरण ओळ्यूं
करतां-करतां आं सगळां सूं
माथा कूट
हुगी हूं काठी बावळी
थांन्नै कीं गिनार ई कोनी
कैड़ा जबरा मिनख हो थें।

म्‍हारै जीव री जड़ी 

पुळक-पुळक
पाळणै झुलराई
झुलरातां-झुलरातां
पाळणै
जाणै कद हालण लागगी
गुडाळियां
हालतां-हालतां गुडाळियां
जाणै कद पकड़-पकड़ पल्लौ
म्हारै ओढणां रौ
ले लिया पगलिया
लैतां-लैतां पगलिया जाणै कद
रमण लागगी डूला-डूली
रमती-रमती डूला-डूली
जाणै कद बणीजण जाणै कद
बणीजती बणीजती जाणै कद
बंटावण लागगी म्हारो हाथ
बंटाती-बंटाती म्हारो हाथ
जाणै कद सीखगी
सगळा रीत-रीवाज
बरत-बार, तीज तिंवार
सीखतां-सीखतां
बरत-बार, तीज तिंवार
जाणै कद हुगी
इतरी स्याणी
सोचूं हूं बैठी
इण रै फेरां में
आ म्हारी धीेंवड़ी
म्हारै जीव री जड़ी।

सावण री डोकरी

डौयां-डौयां
काजळ घालियोड़ी
आ सुरंगां सावण री डौकरी
फर-फर करती इयां फिरै
जाणै कोई
सोळा बरसां री हवैकरी
कोरी चार मइना काम माथै आवै
आठ मइना बैठी खावै
उण में भी इतरावै
वा भाई वा 
कैड़ी गजब री
इणरी नौकरी।

(साभार- कविता कोश)
 
9 वर्ष पहले

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