-बशीर बद्र-
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता
तुम मेरी ज़िन्दगी हो, ये सच है
ज़िन्दगी का मगर भरोसा क्या
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता
वो चांदनी का बदन खुशबुओं का साया है
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है
तुम अभी शहर में क्या नए आए हो
रुक गए राह में हादसा देख कर
वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का
रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुश्बू
(साभार-रेख़्ता)
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