साहित्य, विचार और कलाओं की बहुचर्चित हिंदी वेब पत्रिका समालोचन अपनी यात्रा के डेढ़ दशक पूरे कर रही है। 12 नवम्बर 2010 को समालोचन का पहला अंक इंटरनेट पर प्रकाशित हुआ था।
प्रख्यात कवि, लेखक और समीक्षक विष्णु खरे ने 2016 में इस पत्रिका के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा था
समालोचन पर जो यह सब हो रहा है, उसके लिए ‘अद्भुत’ शब्द भी अपर्याप्त है। इंटरनेट और ब्लॉगिंग के इतने बहुआयामी इस्तेमाल का ऐसा दूसरा उदाहरण विश्व में शायद ही कहीं देखने को मिले।
समालोचन हिंदी की मुख्यधारा की डिजिटल पत्रिका के रूप में स्थापित है, उसने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता, कलात्मक दृष्टि और आलोचनात्मकता से नई साहित्यिक परंपरा गढ़ी है। पिछले पंद्रह वर्षों में 2,600 अंकों का प्रकाशन और 1,000 से अधिक लेखकों के योगदान के साथ यह साहित्यिक यात्रा का एक डिजिटल साहित्यिक इतिहास है।
समालोचन की सबसे बड़ी ताकत रही है उसकी वित्तीय स्वायत्तता और निःशुल्क पहुंच, जिसने उसे किसी दबाव या आश्रय से मुक्त रखा। इस अवसर पर ‘समालोचन’ ने एक पोस्ट के जरिए अपने सभी लेखकों, पाठकों और शुभचिंतकों के प्रति हृदय से आभार प्रकट किया है।
पोस्ट में कहा गया है-
आज जब पूरी दुनिया ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के युग में विवेक और तर्क की धुंध से जूझ रही है, तब ‘समालोचन’ जैसी पत्रिकाएं एक प्रकाशस्तंभ की तरह खड़ी हैं जो विचार की लौ को बुझने नहीं देतीं। सरस्वती जैसी ऐतिहासिक पत्रिकाओं की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, समालोचन ने डिजिटल युग में साहित्यिक-सामाजिक विमर्श की नई ज़मीन तैयार की है। समालोचन’ आज हिंदी साहित्य का एक जीवंत अभिलेख है, बीते डेढ़ दशक की कविता, आलोचना, अनुवाद, विचार की निरंतर ‘डिजिटल स्मृति’. आगे भी यह पत्रिका त्वरित ही नहीं, उत्तरदायी बनी रहे। यही इसका संकल्प है। इस विशेष अवसर पर ‘समालोचन’ अपने सभी लेखकों, पाठकों और शुभचिंतकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता है। इसकी यात्रा भारतीय बौद्धिक समुदाय की सामूहिक इच्छाशक्ति का प्रमाण है।
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