जो सीने पर गोली खाने को आगे बढ़ जाते थे
भारत माता की जय कहकर फाँसी पर चढ़ जाते थे
जिन बेटों ने धरती माता पर कुर्बानी दे डाली
आजादी के हवन-कुंड के लिये जवानी दे डाली
दूर गगन के तारे उनके नाम दिखाई देते हैं
उनके स्मारक भी चारों धाम दिखाई देते हैं
वे देवों की लोकसभा के अंग बने बैठे होंगे
वे सतरंगे इंद्रधनुष के रंग बने बैठे होंगे
उन बेटों की याद भुलाने की नादानी करते हो
इंद्रधनुष के रंग चुराने की नादानी करते हो
काव्य कैफ़े में जब डाॅ. हरिओम पंवार ने शहीदों को याद करते हुए यह पंक्तियां पढ़ी तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो गये। माहौल बन गया। पंक्तियां उन्होंने आज़ादी के लिए शहीद होने वाले जवानों को समर्पित की।
जी हां, मौका था 'मां तुझे सलाम' कार्यक्रम का, डिजिटल मंच ठीक सात बजे सज चुका था, हास्य-व्यंग्य के पुरोधा व वाचिक परंपरा के अग्रणी कवि अशोक चक्रधर, वीर रस और ओज के सशक्त हस्ताक्षर डाॅ हरिओम पंवार, राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण कवि डाॅ. राहुल अवस्थी, राहुल शर्मा और युवा गीतकार प्रवीण कुमार पाण्डेय 'प्रज्ञार्थू' जैसे मेहमान कवियों की आमद हो चुकी थी।
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला की ओर से देश के शहीदों को समर्पित कार्यक्रम 'मां तुझे प्रणाम' के तहत 'ज़रा याद करो कुर्बानी' कार्यक्रम के माध्यम से अमर उजाला काव्य कैफ़े ऑनलाइन कवि सम्मेलन में देश के दिग्गज कवियों की उपस्थिति से महफ़िल गूंज उठी।
कवि सम्मेलन के संचालन की महती भूमिका निभाने की जिम्मेदारी वाचिक परंपरा के अग्रणी कवि अशोक चक्रधर ने संभाली। उन्होंने कार्यक्रम की भूमिका में राष्ट्रीय आंदोलन के दौर के और हिंदी के महत्वपूर्ण कवियों मसलन मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, रामधारी सिंह 'दिनकर' और 'हल्दीघाटी' लिखने वाले श्यामनारायण पाण्डेय के काव्य में राष्ट्रीय चेतना को याद किया। उसके बाद कार्यक्रम की भूमिका में राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक तिरंगे झंडे के स्वरूप को बताने के लिए स्वरचित गीत की कुछ पंक्तियां भी अशोक जी ने पढ़ी-
सारे वतन का प्यारा, नयनाभिराम सारा
संसार भर में ऊंचा, झंडा रहे हमारा
गाता गगन में हरदम, अम्नो-अमां की सरगम
हम शांति के पुजारी, पर शक्ति में नहीं कम
इन पंक्तियों के बाद अशोक चक्रधर ने कार्यक्रम की शुरुआत करने के लिए राष्ट्रीय चेतना और ओज के महत्पूर्ण हस्ताक्षर डाॅ. राहुल अवस्थी को काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया। डाॅ. राहुल अवस्थी ने आज़ादी के मूल्यों को याद करते हुए, शहीदों- बलिदानियों के कुर्बानियों की स्मृतियों को ताजा करते हुए एक से बढ़कर एक छंद पढ़े। उनकी कुछ पंक्तियां देखिए-
पूछा गया कक्षा में कि किससे बड़ा है कौन
एक नए कहा कि कुछ धन से बड़ा नहीं
दूसरे ने कहा कुछ तन से बड़ा नहीं है
तीसरे ने कहा कुछ मन से बड़ा नहीं
चौथे ने कहा कि क्षण पांचवे ने कहा प्रण
छंठे ने कहा कि जन गण से बड़ा नहीं
सातवें ने कहा कोई कितना बड़ा हो किन्तु
आख़िर में अपने वतन से बड़ा नहीं
अमर शहीदों को समर्पित उनकी पंक्तिया थीं-
बेटे के बिछोह और भाई के वियोग में जो
आँखों से बहा था नीर, नीर वो अमर है
पिय राह देखती थी हीर धर धीर पर
कह न सकी जो पीर, पीर वो अमर है
जिसने कि शत्रुओं के आयुधों से निज वक्ष
अड़ा दिया हर रणधीर वो अमर है
माटी पे निछावर हुआ जो हँस-हँस कर
देश पे शहीद हर वीर वो अमर है
अशोक चक्रधर जैसे पुरोधा कवि के संचालन और डाॅ. राहुल अवस्थी के काव्यपाठ से महफ़िल में समां बंध गयी। कवि सम्मेलन में ऑनलाइन दर्शक जुड़ते जा रहे थे। अब बारी थी युवा गीतकार प्रवीण कुमार पाण्डेय 'प्रज्ञार्थू' की, जो संगीत में प्रभाकर भी हैं। मंच पर आते ही ऊंचा अलाप लेकर उन्होंने अपने गीत की शुरुआत की जिसकी पंक्तियां इस प्रकार थीं कि-
इक जोगी खड़ताल उठाकर अपने स्वर में गाये
अपनी माँटी के वंदन में गीत अनोखा गाये
गाये बस गाता जाये फिर फिर मुड़कर यह गाये
मैं तुझे हिंदुस्तान कहूँ या कि अपनी पहचान कहूँ।
उनके कर्णप्रिय स्वर को शेष सभी कवियों ने सराहा और संचालक अशोक चक्रधर ने कहा भी कि अगर मंच पर हम होते और सामने दर्शकगण होते तो आपके इस स्वर पर हजारों तालियों की गड़गड़ाहट मिलती। प्रवीण की कुछ और पंक्तिया देखिए-
समर्पण है परवाने का
भ्रमर की प्रीत निराली है ।
हार है जहाँ बहुत प्यारी
हार की जीत निराली है।
दूसरे के दुःख में रोना
जहाँ की रीत निराली है।
स्वर्ग की उपमा या जीवित उपमान कहूँ
मैं तुझे हिंदुस्तान कहूँ या कि अपनी पहचान कहूँ।
ग्रामीण भारत का चित्र उकेरते हुए उन्होंने गीत की पंक्तियां पढ़ी-
फसल खुशहाली की बो कर
सहेजे हैं अपनापन गाँव।
घनी शीतल प्यारी प्यारी
पुराने पीपल वाली छाँव।
कहीं प्रियजन के आने का
शकुन कह देने वाली काँव।
किसी का अल्हड़पन या फिर मुस्कान कहूँ
मैं तुझे हिंदुस्तान कहूँ या कि अपनी पहचान कहूँ।
प्रवीण के बाद अब राहुल शर्मा 'अक्षत' को काव्यपाठ करने के लिए आमंत्रित किया गया। राहुल शर्मा 'अक्षत' युवा कवि हैं, अमूमन रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों से पात्रों का चुनाव करते हैं और उन्हीं पात्रों के ज़रिये अपने काव्यात्मक चेतना की उड़ान भरते हैं। उन्होंने सबसे पहले एक छंद पढ़ा जिसे सभी लोगों ने सराहा-
युद्ध है समक्ष, तो विपक्ष और पक्ष के प्रत्येक दक्ष का भी धीर कक्ष डोलने लगा,
देख दशा द्रौपदी की, वीर पुत्र पांडुओं की धमनियों में बूंद बूंद रक्त खौलने लगा,
पांचजन्य की सुनी जो गूंज, ले भुजाओं में हरेक वीर अस्त्र और शस्त्र तोलने लगा,
धड़ गिरे विशाल, हो बेहाल देख के कपाल, काल भी तो जय जय महाकाल बोलने लगा
इसके बाद राहुल ने भगत सिंह को याद करते हुए एक कविता पढ़ी-
बात सुनाऊँ मैं तुमको आज़ादी के मतवालों की
देख हौंसले जिनके छाती फट जाती थी कालों की
हे बात सुनो हे बात सुनो अब आज़ादी की बात सुनो
हे बात सुनो हे बात सुनो अब भगत सिंह की बात सुनो
क्यूँ याद करूँ क्यूँ याद करूँ मैं शांति वाली भूलों को
मैं याद करूँगा भगत सिंह तेरी फाँसी के झूलों को
राहुल की कविता सुनने के बाद कवि और संचालक अशोक चक्रधर ने करगिल शहीद विजयंत थापर की याद में एक कविता पढ़ी और शहीदों को याद किया-
जब भी तिरंगे में लिपटा कोई ताबूत आया
टीवी ने उस समय बहुत रुलाया
इस कविता ने माहौल को संवेदनशील कर दिया।
इसके बाद राष्ट्रवाद के महत्वपूर्ण कवि और आज के कवि सम्मेलन के अध्यक्ष डाॅ. हरिओम पंवार ने देश में भूख से होने वाली मौतों पर अफसोस जताते हुए और भूख से कोई न मरे, इसके पक्ष में कानून की मांग करती हुई कविता पढ़ी-
मेरा गीत चांद है, ना चांदनी है आजकल
ना किसी के प्यार की ये रागिनी है आजकल
मेरा गीत हास्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
साहित्य का भाष्य भी नहीं है माफ़ कीजिये
मैं गरीब के रुदन के आंसुओं की आग हूं
भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूं
अंत में सभी कवियों ने दर्शकों से अमर उजाला के 'मां तुझे प्रणाम' कार्यक्रम से जुड़ने की अपील की।
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6 वर्ष पहले
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