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Kuknus: सकारात्मकता, सृजनात्मकता सामूहिकता, सदाशयता की अनूठी मिसाल

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यह एक स्थापित सत्य है कि साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। जैसा समाज होता है उसका प्रतिबिम्ब साहित्य में परिलक्षित होता रहा है। साहित्य समकालीन विषयों के साथ ही समाज में पनपती व्यवस्थाओं की विसंगतियों को प्रमुखता से उठाता रहा है। अतीत की ऐतिहासिक स्मृतियां समेटे और भविष्य की दिशा कुण्डली थामे, वर्तमान के करखे पर समकालीन संदर्भ प्रसंगों के ताने बाने बुनता साहित्य और इस साहित्यक संचेतना को सहेजता परिवेश प्रगतिशील समाज की पहचान होता है। समय समय पर नए प्रयोग, नव विमर्श साहित्य को नई दिशा में मोड़कर साहित्य की अविरल धारा को न केवल समृद्ध करते हैं, बल्कि इस धारा से वंचित सूखी रेतीली जमीं में प्राण फूंकते हुए साहित्य के औचित्य को प्रमाणिकता और लक्ष्य भी प्रदान करते हैं। एक ओर यह नए नए क्षेत्रों और विमर्शों का अन्वेषण करते हैं तो दूसरी ओर समाज को उसके लिए हौले हौले से तैयार भी करते हैं, वो जमीन तैयार करते हैं जहां परिवर्तन के बीज रोपें जा सकें जहां इनकी सबसे ज्यादा दरकार है। अतीत में हुए कई आंदोलनों की कोख से जन्मे परिवर्तनों में साहित्य की भूमिका से कौन अनभिज्ञ होगा? नव प्रयोगों की इसी कड़ी में आज एक और विमर्श को साहित्य के एक अभिन्न और आवश्यक विमर्श की तरह ही प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है वह है विकलांगता विमर्श भारत में विकलांग अत्यंत वंचित वर्ग है। इनकी समस्याएं तथा स्थिति सामान्यजन की अपेक्षा पृथक हल की मांग करती है। साहित्य में उनकी बात ही नहीं की जा रही है। कई लोग विकलांगता विमर्श को ठीक वैसे ही देखते हैं जैसे वे विकलांगों को देखते रहें हैं निरीह, लाचार, उपेक्षणीय,तिरस्कृत ….

ये तथ्य ध्यान देने योग्य हैं कि एक दशक पहले 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 2.68 करोड़ दिव्यांग जनसँख्या है जो सम्पूर्ण जनसँख्या का 2.21 % है । इतनी बड़ी जनसंख्या के प्रति समाज और साहित्य की उदासीन रवैये में कोई परिवर्तन नहीं होना अत्यंत निराशाजनक है। इस विमर्श की स्थापना के प्रति प्रणबद्ध डॉ गीता शर्मा ने अब तक कविताओं और कहानियों के जरिए अपनी बात रखी है। इसी क्रम में उनके कहानी संग्रह मुड़ कर देखो मुझे और साझा कहानी संग्रह कुकनुस साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने के लिए प्रयासरत हैं। उनके संपादन में हालिया प्रकाशित साझा कहानी संग्रह में पद्मश्री उषा किरण खान जी,गोपाल माथुर,कृष्ण बिहारी,प्रताप दीक्षित,सुषमा मुनीन्द्र ,मनीषा कुलश्रेष्ठ ,मनीष वैद्य, उजला लोहिया,पद्मा शर्मा,किसलय पंचोली,अरुण अर्णव, संतोष श्रीवास्तव जी जैसे नामचीन कहानिकारों की कहानियां संकलित किया गया है। वे बताती हैं कि जब इस कहानी-संकलन की योजना बना रही थी तो मैं इसमें हिंदी-साहित्य के नामचीन कथाकारों को लेकर एक साझा संकलन के लिए प्रणबद्ध तो थी लेकिन सशंकित भी थी। मैं सोच रही थी कि क्या मेरे आग्रह पर कोई प्रतिष्ठित साहित्यकार अपनी कहानी मुझे देगा? लेकिन मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य रहा कि सभी स्वनामधन्य सम्मानित कहानीकारों ने मुझे न सिर्फ़ अपनी कहानी भेजी बल्कि ज़रूरी सुझाव भी दिए।
 
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2 वर्ष पहले

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