आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पहली बार हिंदी को बुकर प्राइज़: गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' को मिला सम्मान

Gitanjali Shree's novel 'Tomb of Sand' gets International Booker Prize
                
                                                         
                            वरिष्ठ कथाकार गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत-समाधि’ को इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ 2022 के लिए चुन लिया गया है। हिन्दी की यह पहली किताब है जिसने वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित यह पुरस्कार हासिल किया है। ‘रेत-समाधि’ के अंग्रेजी में डेजी रॉकवेल द्वारा किए गए अनुवाद 'टॉम्ब ऑफ सैंड' को इस पुरस्कार के लिए चुना गया है। इस घोषणा पर ‘रेत-समाधि’ की लेखक गीतांजलि श्री, अनुवादक डेजी रॉकवेल और इसको हिंदी में प्रकाशित करनेवाले राजकमल प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अशोक महेश्वरी ने खुशी जताई है।
                                                                 
                            

अशोक महेश्वरी ने कहा, ‘रेत-समाधि’ को बुकर पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के साथ ही अन्तरराष्ट्रीय जगत में हिन्दी साहित्य और भारतीय भाषाओं के साहित्य की नए सिरे से चर्चा हो रही है। यह उत्साहवर्द्धक है। ‘रेत-समाधि’ को पुरस्कृत कर बुकर फाउंडेशन ने ऐसी एक कृति को रेखांकित किया है जो लीक से हटकर है।

राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक ने कहा,  मेरी राय में ‘रेत-समाधि’ हिन्दी उपन्यास की प्रचलित परम्परा से काफी हटकर है। यह अपने प्रयोगों से उस परम्परा में काफी कुछ जोड़ती है, उसका विस्तार करती है। इसमें चकित करनेवाली नवीनता है। बुकर जूरी के सदस्यों ने ‘रेत-समाधि’ की इन खासियतों को पहचाना। वे इस उपन्यास पर मुग्ध थे। वास्तव में यह भारतीय परिवार का ‘महाभारत’ है। महाभारत से आशय इस उपन्यास की महाकाव्यात्मकता से है। भारतीय परिवार में जो कुछ है, जो कुछ हो सकता है वह सब कुछ ‘रेत-समाधि’ में है। परिवार ही नहीं, पृथ्वी का चराचर जगत जिस रूप में ‘रेत-समाधि’ में व्यक्त हुआ है वैसा शायद ही किसी अन्य उपन्यास में हुआ हो। इसमें मनुष्य और मनुष्येत्तर जीव ही नहीं, सरहद जैसी निर्जीव चीजें भी संवाद करती हैं। दुनिया को देखने की यह एक विलक्षण दृष्टि है जो गीतांजलि श्री के इस उपन्यास में अपने पूरे वैभव के साथ हमें मिलती है।

अमेरिकन राइटर-पेंटर डेज़ी रॉकवेल ने टॉम्ब ऑफ सैंड के नाम से इस उपन्यास का इंग्लिश में अनुवाद किया। यह उपन्यास दुनिया की उन 13 पुस्तकों में शामिल था, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार की लिस्ट में शामिल किया गया था। टॉम्ब ऑफ सैंड बुकर जीतने वाली हिंदी भाषा की पहली किताब है। साथ ही किसी भी भारतीय भाषा में अवॉर्ड जीतने वाली पहली किताब भी है।
 
इस पुरस्कार को जीतने के बाद उत्तर प्रदेश के मैनपुरी की गीतांजलि श्री ने कहा कि, वह काफी खुश हैं। खुशी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा- “मैंने बुकर का सपना कभी नहीं देखा था। मैं चकित हूं, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा कर सकती हूं।“ गीतांजलि श्री अब तक तीन उपन्यास और कथा संग्रह लिख चुकी हैं। उनके उपन्यासों और कथा संग्रह को अंग्रेजी, जर्मन, सर्बियन, फ्रेंच और कोरियन भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
 
डेज़ी रॉकवेल द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित इस उपन्यास की मुख्य किरदार 80 वर्षीय एक महिला है।  दोनों को इस पुरस्कार के लिए 50,000 पाउंड (63,000 डॉलर) की राशि दी गई है, जो दोनों में समान रूप से बंटेगी।  गीतांजलि जहां नई दिल्ली में रहती हैं, तो रॉकवेल वरमोंट में रहती हैं।

इस पुस्तक के साथ दुनिया भर की 13 पुस्तकें इस पुरस्कार के लिए रेस में थीं।  जजों के पैनल की अध्यक्षता करने वाले अनुवादक फ्रैंक वाईन ने बताया कि, जजों ने बहुत भावुक बहस के बाद बहुमत से ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ को इस खिताब के लिए चुना।  उन्होंने कहा कि, यह भारत और विभाजन का एक चमकदार उपन्यास है, जिसकी मंत्रमुग्धता, करुणा युवा उम्र, पुरुष और महिला, परिवार और राष्ट्र को कई आयाम में ले जाती है।  वाईन ने कहा कि, दर्दनाक घटनाओं का सामना करने के बावजूद, यह एक असाधारण रूप से अविश्वसनीय पुस्तक है।

इस उपन्यास में 80 वर्षीय बुजुर्ग विधवा की कहानी है, जो 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद अपने पति को खो देती है। इसके बाद वह गहरे अवसाद में चली जाती है।  काफी जद्दोजहद के बाद वह अपने अवसाद पर काबू पाती है और विभाजन के दौरान पीछे छूटे अतीत का सामना करने के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला करती है।  

अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार हर साल यूके या आयरलैंड में प्रकाशित उपन्यास के अनुवाद के लिए दिया जाता है। यह अंग्रेजी भाषा के कथा साहित्य के लिए बुकर पुरस्कार के साथ चलाया जाता है।  इस पुरस्कार की स्थापना अन्य भाषाओं में कथा साहित्य को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
 

रेत समाधि पर कुछ टिप्पणियाँ 
"यह उपन्यास है या क्या है? कुछ लोग पूछेंगे. अरे, भाई किसने कहा है कि उपन्यास को, आपके भीतर बैठी उपन्यास की शक्ल जैसा ही होना चाहिए हर बार! उसकी शक्ल बदल भी तो सकती है. बदलनी चाहिए भी. नहीं तो ताजगी नाम की च़ीज गायब हो जाएगी. और भाषा तमाम बातें, तमाम मानवीय मर्म भी नहीं व्यक्त कर पाएगी! तो यह गीतांजलिश्री का ताजा-उपन्यास है, और इसमें ग़ज़ब की ताजगी है. इसमें मेरे लिए बहुत-सी कविताएँ भी हैं. गद्य में सही. नाटक और फ़िल्म दृश्य हैं. चित्र हैं. संस्मरण हैं. यात्राएँ हैं. रोज का उठना-बैठना-चलना फिरना है. चित्रकार रामकुमार भी हैं, रफ़ी-किशोर भी हैं, किसी संदर्भ में. और ‘रीबाक’ जूतों वाला प्रसंग तो आज के सत्ता खेल की खाल उधेड़ देता है. सबको टटका बना दिया गया है. मैं तो कोई भी पन्ना उठाता हूँ, और पढ़ने लगता हूँ : उसमें कुछ देखी-जानी कहानियाँ- बातें भी जुड़ने लगती हैं, मैं भी उसमें कुछ अपना और लिखने लगता हूँ. मन ही मन! यह उपन्यास भरोसा दिलाता है कि यह साँसों पर कब्जा करने वालों, उनको कुचलने वालों के, खिलाफ़ है. खुली साँस की ज़रूरत महसूस करते हुए ही, इस उपन्यास को पढ़ने का आनंद है।"
- प्रयाग शुक्ल, वरिष्ठ कवि-अनुवादक और कला समीक्षक

"गीतांजलि श्री का उपन्यास `रेत-समाधि’ भी एक ही ऐसी रचना है. वैसे तो ये ठेठ उपन्यास है और इसमें एक मुख्य कथा है जिससे जुड़ी कई आनुषंगिक कथाएं भी हैं.  पर जिस तरह से ये कथाएं कही (या लिखी गई हैं) उसमें कथालोक के साथ विस्तीर्ण काव्यलोक भी है.  इसमें एक नायाब किस्म की किस्सागोई भी है. घुमावदार और कुछ जगहों पर आकस्मिकताओं को समेटे हुए.  इन किस्सों का भरपूर और सघन आस्वाद आप तभी ले पाएंगे जब इसे आहिस्ता आहिस्ता पढ़ें. हर लफ्ज और हर वाक्य पर ठहरें और उनका भरपूर रस ले. उपन्यास का एक उद्धरण लेकर कहें तो `हर कतरा हर तिनका हर रेशा पुर-एहसास है.‘ काव्यात्मकता के अलावा भाषिक प्रयोग की अन्य छटाएं भी यहां हैं." रवींद्र त्रिपाठी, वरिष्ठ साहित्यकार समालोचक

"1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर की बांग्ला काव्यकृति ‘गीतांजलि’ के अंग्रेजी अनुवाद को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था. 2022 में गीतांजलि श्री के हिंदी उपन्यास ‘रेत-समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद को अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है. लगभग एक शताब्दी में भारतीय भाषाओं के साहित्य और उसकी विश्व में स्वीकारोक्ति को लेकर आये बदलावों को समझा जा सकता है. कविता की जगह अब उपन्यास है और इन वर्षों में हिंदी ने भारतीय भाषाओं के साहित्य के बीच अपनी बढ़त बना ली है. यह पुरस्कार अच्छे अनुवाद की जरूरत और उसके महत्व पर भी प्रकाश डालता है. ज़ाहिर है हिंदी, और साहित्य दोनों के लिए यह उत्साह बढ़ाने वाली खबर है." अरुण देव, संपादक: समालोचन वेब पत्रिका

"रेत-समाधि के अनुवाद टूम ऑफ सैंड पर गीतांजलि श्री और डेज़ी रॉकवेल को जिस दिन साझा बुकर पुरस्कार की घोषणा हुई हिंदी जगत में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। जिस तरह गीतांजलि श्री अपने रचनात्मक एकांत में रहती हैं, सोशल मीडिया के शोर-शराबे वाली दुनिया की नींद उनकी तरफ से खुली और हर कोई रेत-समाधि की बात करने लगा। कुछ लोगों ने उन्हें पढ़ा था कुछ ने नहीं।
मैं जब हम हिंदी लेखन में आई थी तो उनका लिखा हुआ हर पत्रिका में जगर-मगर करता था अलग से। शैल्पिक तोड़ फोड़... नये कथ्य, जादुई भाषा माई, हमारा शहर उस बरस, तिरोहित, उनकी सभी कहानियां... हिंदी के आम कथा लेखन के बरक्स उनका लिखा अलग से रेखांकित होता था। रेत समाधि उपन्यास निश्चय ही लीक से हटकर लिखा गया उपन्यास है जो अपने कथ्य से अधिक शिल्प के लिए सराहा जा सकता है। गीतांजलि श्री हमेशा क्लीशे तोड़ती आई हैं अपनी लेखनी से। रेत समाधि में  कथ्य किसी गहरी नदी के तल की तरह कभी दिखता और कभी ओझल होता है। यह कहानी बिस्तर से लगी बूढ़ी अम्मा चंद्रप्रभा की है जिसमें विभाजन की विडंबना से गुज़री चंचल चंदा और उसका प्रेम भी रहता है। किसी भी पुरस्कृत किताब से उम्मीद की जाती है सरोकार की... यहां ओढ़े हुए, जाने बूझे विमर्श नहीं हैं... लेकिन फिर भी सहज ही स्त्रियों का मन, भटकन, स्वतंत्र चेतनाएं, पितृसत्ता से टकराहट, सांप्रदायिकता, ट्रांसजेंडर्स की भारतीय समाज में स्थिति, बंटवारा और उस पर आज तक हो रही राजनीति भी जल में घुले लवणों की तरह आ जाते हैं। निश्चय ही अंतरराष्ट्रीय बुकर में हिंदी की यह जीत हम सब भारतीयों की जीत है क्योंकि मेरा मानना है कि अनुवाद से पहले कृति है...। यह सम्मान कृति और कृतिकार गीतांजलि श्री का पहले है फिर अनुवादक डेज़ी रॉकवेल का।" -मनीषा कुलश्रेष्ठ, वरिष्ठ कथाकार 
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर