प्रतिष्ठित कवि रामदरश मिश्र को नई दिल्ली में साहित्य अकादमी सभागार में साहित्य के क्षेत्र का वर्ष 2021 का बहुचर्चित 'सरस्वती' सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा दिया जाता है। यह सम्मान कवि और लेखक रामदरश मिश्र को उनकी काव्यकृति ‘मैं तो यहां हूं के लिए दिया गया। सम्मान समारोह में बतौर मुख्य अतिथि दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष, साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं दस्तावेज पत्रिका के संपादक प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक सुरेश रितुपर्ण तथा आलोचक ओम निश्चल भी उपस्थित थे। आलोचक ओम निश्चल ने प्रो. रामदरश मिश्र की रचनाओं पर अपनी अपनी बात रखी।
के.के. बिरला फाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला साहित्य का यह प्रतिष्ठित पुरस्कार किसी भी भारतीय भाषा के लिए दिया जाता है। इस बार यह सम्मान हिंदी की पुस्तक को मिला है। हिंदी में यह सम्मान प्राप्त करने वाले प्रो. मिश्र तीसरे साहित्यकार हैं। इनसे पहले वर्ष 1991 में डॉ. हरिवंशराय बच्चन को और 2013 में गोविन्द मिश्र को यह सम्मान प्रदान किया गया था। इस बार 31वां सरस्वती सम्मान प्रदान किया गया।
वरिष्ठ गीतकार ओम निश्चल ने कहा कि 98 वर्ष की उम्र में भी प्रो. रामदरश मिश्र निरंतर साहित्य की सेवा में लगे हुए हैं। उन्होंने अपनी साहित्य लेखन यात्रा ‘पथ के गीत’ से आरम्भ की थी। रामदरश मिश्र का जन्म गोरखपुर जिले के डुमरी गांव में 14 अगस्त, 1924 को हुआ था। उनकी कविताओं में गांव के दृश्य अक्सर दिखाई देते हैं। ग्रामीण सौंदर्य से सराबोर उनकी कविताओं में प्रकृति की अलग झलक दिखाई पड़ती है।
प्रो. रामदरश मिश्र की रचनाएं 'बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ', 'पक गई है धूप', 'कंधे पर सूरज', 'दिन एक नदी बन गया', 'जुलूस कहां जा रहा है', 'आग कुछ नहीं बोलती', 'बारिश में भीगते बच्चे और 'हंसी ओठ पर आँखें नम हैं', 'ऐसे में जब कभी' हैं। इसके अलावा रामदरश मिश्र ने समय-समय पर ललित निबंध भी लिखे हैं जो 'कितने बजे हैं?, 'बबूल' और 'कैक्टस' में संकलित हैं। इन निबंधों ने अपनी वस्तुगत मूल्यता और भाषा शैलीगत सहजता से लेखकों और पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।
4 वर्ष पहले
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