'जश्न-ए-अदब- 2019' के दूसरे दिन के प्रथम सत्र के कार्यक्रम में 'लोकतत्व का सिनेमा' विषय पर चर्चा के लिए ख़ालिद जावेद, मुकेश गर्ग (भारतीय फिल्म संगीत और गीतों पर लंबा काम किया है), मशहूर अभिनेता पंकज त्रिपाठी, हिंदी के विद्वान, कवि एवं लेखक पद्म श्री अशोक चक्रधर मंच पर उपस्थित थे।
गुफ़्तगू की शुरुआत ख़ालिद जावेद ने पंकज त्रिपाठी से इस सवाल के साथ की कि- "लोक तत्व की उपस्थिति सिनेमा के नरेटिव को कैसे बेहतर करता है ? 'लोक' सिनेमा में विजुअली कैसे प्रभाव छोड़ता है?"
इस सवाल के जवाब में अभिनेता पंकज त्रिपाठी बचपन में दादी-नानी से सुनी हुई दंत कथाओं का जिक्र करते हैं कि - "जब तक कहानियों में हम लोग 'हूं..हूं' करते रहते थे तब तक दादी कहानियां सुनाती थीं, हूं..हूं बंद हुआ तो उन्हें लगता था कि बच्चा सो गया और कहानी बंद।
अब इन्हीं दंत कथाओं में हमारी परवरिश हुई जिसके साथ सिनेमा में उपस्थित हूं, इसी तरह फिल्मी लेखक भी जगह-जगह की दंतकथाओं के साथ लेखन में हैं। बात को आगे बढ़ाते हुए 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' फिल्म का जिक्र करते हैं और कहते हैं फिल्म में कुएं पर हिरोइन कपड़े धो रही है और वहां हीरो पहुंच जाता है, दातुअन करते हुए दिख जाता है, हिरोइन से पूछता है- बियाह हो गया है?
यह फिल्म का बहुत रोमांटिक सीन है। वो इसलिए हो पाया कि लेखक ऐसे ही पृष्ठभूमि से आ रहे हैं जिसमें 'लोक' समाया हुआ है। पहले लोगों की दादी-नानी विदेश में बसती थीं तो गाने यूरोप जाया करते थे। अब रोमांटिक सीन कुएं पर जाकर भी अगर हिट हो रहे हैं तो इसका सारा श्रेय 'लोक' को ही जाता है।
सवाल यह उठता है कि आखिर में लोक है क्या, इसकी उपस्थिति कैसे है। बात को अशोक चक्रधर आगे बढ़ाते हुए कहते हैं- लोक संस्कृति, लोकगीत, लोक पहनावा, लोक मेले, लोक साहित्य, लोक कथा, लोक कविता एक-दूसरे से अलग क्यों हैं?
क्योंकि ये जंगल में खिले हुए फूल हैं। भारतीय सिनेमा में 'लोक तत्व' का प्रवेश कई रास्तों से होता है। पहले तो यह समझ लीजिए कि गीत-संगीत के रास्ते सिनेमा में 'लोक' की महत्वपूर्ण उपस्थिति है। उदाहरण के तौर पर- 'पान खाए सइयां हमारो, मलमल के कुर्ते पर छींट लाल लाल....'
पंकज त्रिपाठी की फिल्म- 'अनारकली ऑफ़ आरा' का जिक्र करते हुए बताते हैं कि फिल्म में उनका नाम रंगीला है। रंगीला शब्द रंगा से आया। रंगा क्या है? रंगा एक तरह की नौटंकी थी पुराने ज़माने में। अब रंगीला के रूप में समने आता है 'फ़ोक' कभी मरता नहीं।
सभ्यता अब इतनी आगे बढ़ गई है और लोगों को लगता है कि 'लोक' सिमटता जा रहा है और हम अब तो पाॅप म्यूजिक के जमाने में पहुंच चुके हैं। लेकिन यह भ्रम जैसा है लोक कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में हर जगह उपस्थित रहता है।
'फोक' का तत्व भजन की धुनों में अक्सर दिखता था: मुकेश गर्ग
'लोक' कैसे पैदा होता है, कहां से चला, अभी कहां है। इन सवालों की गहराई में उतरते हुए मुकेश गर्ग बहस को आगे बढ़ाते हैं और कहते हैं - भरत ने जब 'नाट्यशास्त्र' की रचना की तो उन्होंने लिखा कि- 'नाटक' दरबारियों के लिए नहीं है। यह प्रजा के लिए है। यहां से धीरे-धीरे एक 'दरबार' हो गया और एक 'लोक' हो गया। 'लोक' अलग चलता रहा और 'दरबार' अलग गुल खिलाता रहा। लेकिन जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तब संगीत की भूमिका बड़ी हो गई।
शुरुआत में क्लासिकल म्यूजिक की बंदिशें ही गायक गाया करते थे और वही फिल्म का संगीत बन जाता था। 'फोक' का तत्व भजन की धुनों में अक्सर दिखता था। लेकिन 40 के दशक के बाद आज़ादी नजदीक आ रही थी और जैसे-जैसे आम आदमी की बातें महत्वपूर्ण हो रही थीं वैसे-वैसे 'लोकतत्व' भी मजबूत हो रहा था।
50 के दशक में नौशाद, मदन मोहन, शंकर जयकिशन जैसे लोग फिल्मी दुनिया में कदम रखते हैं। ये सभी लोग देश के अलग-अलग कोनों से एक जगह इकठ्ठा हो रहे थे। चूंकि अलग-अलग स्थानों से थे तो अलग-अलग 'फ़ोक' के साथ आ रहे थे।
मुकेश आगे बताते हैं कि- 'फोक' अब गया, असली 'फोक' अब फिल्म म्यूजिक है' यह बात 1955 में एक सेमिनार में नौशाद साहब ने कही थी। मैं इससे सहमत नहीं हूं क्योंकि 'फोक' म्यूजिक तब पैदा हुआ जब सभ्यता का विकास हुआ, मेहनत, मजदूरी और श्रम जब लगा तब इंसान ने अपनी ज़िंदगी के लिए 'फोक' का निर्माण किया।
फिल्म म्यूजिक 'फोक' से उधार लेता है, क्लासिकल से उधार लेता है और अपनी अद्भुत प्रतिभा के दम पर उनका ऐसा मिश्रण करता है कि वो सारी दुनिया के ऊपर नाचने लगता है। ये लोकप्रियता खेतों से और गांवों से आती है। बड़े घरों से भी आती है।
हर जगह की 'धुन' अपना बाजा भी साथ लेकर आती है: अशोक चक्रधर
बहस आगे बढ़ती है और बात इस पर आती है कि 'लोकसंगीत' सिनेमाई गीतों में कैसे घुला मिला हुआ है। इस बहस को अशोक चक्रधर आगे बढ़ाते हैं- एक है लोक संगीत और एक है लोकप्रिय संगीत।
'लोक' को लोकप्रिय बनाने के लिए उसमें 'फोक कंटेंट' भी है, क्लासिकल कंटेंट भी है। जैसे वोमनिया...वो रे वोमनिया ...गीत खालिस फोक है। लेकिन उसमें लगी मुरकियों को देखेंगे, उसके अंत:संगीत को देखेंगे तो उसमें आपको रागदारी नज़र आयेगी। एक तरफ रागदारी है तो एक तरफ खालिस लोक जो सिर्फ ढोलक के साथ बजते थे।
ढोलक के साथ इंस्ट्रूमेंट बढ़े और सिंथेसाइजर भी आया और उसने अपना काम भी करना शुरू कर दिया। लेकिन टिपिकल 'फोक' भारतीय वाद्ययंत्रों के साथ जब बजता है तभी हमारे हृदय को छूता है। हर जगह की 'धुन' अपना बाजा भी साथ लेकर आती है।
पंकज त्रिपाठी लोक कलाओं को समझने के लिए अपनी यात्र का अनुभव शेयर करते हैं- नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ते हुए बहुत सारी लोक कलाओं से लोगों का परिचय कराया जाता है और देश के कोनों-कोनों में भेजा भी जाता है, इसी क्रम में हमें महाराष्ट्र भेजा गया। इसके बाद हर जगह का नाटक भी करवाया जाता है। महाराष्ट्र में कई तरह की लोक कलाएं हैं जैसे दशावतार, पंढरपुर का गायन इत्यादि।
कोंकड़ में एक महीने रहकर दशावतार सीखा। ड्रामा स्कूल में पढ़ते हुए और अभिनय की दुनिया में सक्रिय रहते हुए अंतत: मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि- जो लोकल है, वही ग्लोबल है। बतौर अभिनेता मैं यह कहना चाहूंगा कि स्वत: स्फूर्तता बहुत जरूरी है। लोक कलाओं में स्वत: स्फूर्तता की उपस्थिति है।
'लोक' अपने विभिन्न रूपों में उपजता कैसे है? अशोक चक्रधर जी बताते हैं- शोषण होगा तो उससे पीर की भाषा निकलेगी, उसमें विदेशिया, चैती और विरह की संवेदनाएं निकलेंगी। प्रेम में प्रेम गीत निकलेंगे। इस तरह आंसू और मुस्कान का शीतल ज्वालामुखी 'लोकतत्व' बनके हमारे सामने प्रकट होता है।
अंतत: भारतीय संगीत में 'लोक' कैसे घुला रहता है ? मुकेश गर्ग कहते हैं- भारतीय संगीत में मैलोडी की महत्ता है। मैलोडी बनती है मीड़गमक से। किसी चीज को किसी दूसरी चीज से मिलाया जाए, यह संगीत निर्देशक को अच्छी तरह पता रहता है। मिलाना क्या है? जो कुछ मिलकर सामने आता है उसमें जगह-जगह के 'फोक' की मिलावट होती है।
अशोक चक्रधर भारत महोत्सव की गाथा सुनाने के लिए रूस गये थे। एक वाकये का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि- वहां पर राजस्थान, ओडिशा, बंगाल और देश के कोने-कोने से लोक कलाकार आये हुए थे। किसी ने लिफ्ट को चील गाड़ी के नाम से पुकारा। ये वे लोग थे जिनके लिए लिफ्ट जैसे यंत्र नये थे तो लोगों ने उसे चीलगाड़ी के नाम से पुकारा। कहने का आशय यह कि लोक में शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता होती है।
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7 वर्ष पहले
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