शकील खान
कला समीक्षक
भारत भवन के अंतरंग सभागार में चल रहे पांच दिवसीय नाट्य समारोह की तीसरी शाम 'चरणदास चोर' के नाम थी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालाय नई दिल्ली के आयोजन 'भारत रंग महोत्सव' में कोलकाता से आई बंग्ला भाषी टीम द्वारा प्रस्तुत 'चरणदास' देखना दिलचस्प था। दिलचस्पी इसलिए भी क्योंकि यह प्रस्तुति बंग्ला भाषा में होनी था जबकि भोपाल और देश-दुनिया के रंगप्रेमियों ने इसे अब तक छत्तीसगढ़ी या हिंदी में ही देखा था। वैसे भी चरणदास चोर और हबीब तनवीर एक दूसरे में इस तरह समाए हुए हैं कि इस नाटक की कल्पना उनके और उनकी टीम 'नया थिएटर के बिना संभव नहीं लगती।
इन सबके चलते दमदम बिस्वरूपम, कोलकाता के समूह के कलाकारों और निर्देशक बिदिशा चटर्जी पर अतिरिक्त जवाबदारी और चुनौती आ गई थी। उन्हें नया थिएटर और हबीब जी के औरा से न सिर्फ बाहर निकलना था बल्कि चरणदास को नए अंदाज में सामने भी लाना था। साथ ही दर्शकों को संतुष्ट भी करना था।
क्या ऐसा संभव हो पाया? नया थिएटर का डिजाइन देशज और रियलिस्टिक था, जबकि निर्देशक बिदिशा ने इसे बंगला रंगमंच के रूप में पेश किया, जिसमें भव्यता थी। भव्य सेट, संगीत-लाइट की चकाचौंध नाटकीयता से भरपूर प्रस्तुति। यानि बिदिशा इस मामले में तो पास हो गईं कि उनकी प्रस्तुति का अंदाज नया और जुदा था।
लेकिन प्रस्तुति के अलग भर होने से वो श्रेष्ठ नहीं हो जाती। ये कहना कतई सही नहीं होगा कि प्रस्तुति अच्छी नहीं थी, ठीक थी़। लेकिन यह कहने में भी संकोच नहीं कि चरणदास से जिस ऊंचाईयों की उम्मीद की जाती है उस सीढ़ी पर दमदम की परफारमेंस कुछ कदम ही चढ़ पाई। कमी कहां रह गई।
पहली तो यही कि रियलिस्टिक प्रस्तुति को पूरी तरह नाटकीय बना दिया। दूसरे मंच पर बेवजह की भीड़ इकट्ठी कर दी गई थी। चोर, सिपाही, रानी, साधु, खजांची और मंत्री ये कुल मिलाकर छ: मुख्य कैरेक्टर थे। लेकिन मंच पर बीस कलाकारों की भीड़ कई ऐसे दृश्यों में थी, जहां इनसे बचा जा सकता था। बेशक कुछ दृश्यों में ज्यादा कलाकार जरूरी थे, लेकिन वहां भी नजर आ रहे थे जहां नहीं आना थे।
नाटक में एडिटिंग की भी गुंजाइश थी। ओपनिंग सीन सुंदर था, संगीत और लाइट इसे रोचक भी बना रहे थे लेकिन इसे इतना लंबा खींच दिया था कि उसका इंपैक्ट ही खत्म हो गया। बाद में निर्देशक की अनाउंसमेंट ने चौंका दिया कि अभी तो नाटक शुरू ही नहीं हुआ है, प्रयोग अच्छा हो सकता था, अगर छोटा होता।
रानी, महारानी या राजे-महाराजे कभी कोने में जाकर नहीं विराजते, राजमहल के मध्य में सबके बीच में इनका आसन हुआ करता है, जो उनकी हैसियत को सामने लाता है। लंबे रेंप वाला सेट नयनाभिराम तो था, लेकिन रानी के मचाननुमा सिंहासन की प्लेसमेंट बेहतर नहीं थी। हां रेंप के नीचे का हिस्सा एप्रोप्रिएट था खासतौर पर चरणदास का ठिकाना बहुत ही दिलचस्प था।
नृत्य-संगीत बंगालियों की आत्मा में रचा-बसा है। इसलिए उनके नाटक में इन दोनों का होना जरूरी है। चरणदास में इसकी उपस्थिति सबसे प्रभावी रूप में दर्ज थी। संगीत कर्णप्रिय था और नृत्य नयनाभिराम। कलाकारों का अभिनय भी नाटक का उजला पक्ष था। चरणदास चोर तो श्रेष्ठ था ही बाकी कलाकार भी कम नहीं थे।
ब्रोशर में कलाकारों के नाम उनके चरित्र के साथ नहीं थे इसलिए पता नहीं चलता कि किस रोल में कौन-सा कलाकार था इसलिए उस तरह कलाकरों का जिक्र संभव नहीं। पर लगभग सभी कलाकार अभिनय में दक्ष नजर आए। पुलिस वाला भी रोचक था, रानी खूबसूरत भी थी और अच्छी अभिनेत्री भी। दर्शकों के बीच से कलाकारों की एंट्री और एक्जिट पुराना पड़ चुका गिमिक है।
सब कुछ अपनी जगह लेकिन चरणदास चोर को देखना हमेशा से रोचक रहा है। और इसका कथानक बहुत कॉमन हो चुका है इसलिए बंग्ला भाषा आड़े नहीं आती। हबीब तनवीर द्वारा लिखा और उनके द्वारा ही रचा गया यह नाटक अपने रोचक कथानक के कारण लोगों को भाता है।
बता दें हबीब की स्क्रिप्ट का रूपांतरण राम प्रसाद बनिक और विश्वरूप चट्टोपाध्याय ने किया था। उन्होंने इसका शीर्षक 'चरणदास चोर' की जगह 'चरणदास' कर दिया था।
बहरहाल कहानी पर आते हैं। चरणदास अपने गुरू साधु के सामने पांच वचन देता है। हाथी-घोड़े के जुलूस में सवारी नहीं करूंगा, सोने-चांदी की थाली में नहीं खाउंगा, राजा बनाना चाहा तो भी नहीं बनूंगा, किसी रानी से शादी नहीं करूंगा। इन चार वचन से गुरू समझ जाते हैं कि ऐसे वचन किए जा रहे हैं जो चरणदास आसानी से पूरा कर लेगा क्योंकि उसकी जिंदगी में ये मौके आने वाले ही नहीं हैं, फिर भी गुरू चरणदास की शरारत को नजरअंदाज करते हुए उससे पांचवा वादा करने को कहते हैं और पांचवा वचन था हमेशा सच बोलोगे।
उम्मीद के खिलाफ चोरी करने के बावजूद सच बोलने से रानी चरणदास से प्रभावित होती है और मंत्री को आदेश देती है कि उसे गाजे-बाजे और जुलूस के साथ राजमहल लाया जाए। वो इनकार करता है और फिर गिरफ्तार करके लाया जाता है। सोने-चांदी की थाली में खाने से इंकार करता है। वचन का पक्का और सच बोलने का अहद करने वाला चरणदास राजा बनने से भी मना कर देता है।
रानी उसके इनकार और सच बोलने से इतनी ज्यादा प्रभावित होती है कि उसके सामने शादी का प्रस्ताव रख देती है। वचन का पक्का चरणदास यह भी स्वीकार नहीं करता। आगबबूला रानी उसे मौत की सजा सुनाती है। चरणदास मारा जाता है।
जानना रोचक होगा कि इस पर श्याम बेनेगल ने फिल्म भी बनाई है। यह उनकी शुरुआती फिल्म थी जो उन्होंने बाल चित्र समिति के लिए बनाई थी। बच्चों के लिए बनने वाली इस फिल्म के अंत में हीरो का मारा जाना बेनेगल का पसंद नहीं था। उनका मानना था कि बच्चों की फिल्म का अंत सुखांत होना चाहिए। सो इसके स्क्रीनप्ले राइटर हबीब तनवीर ने इसके अंत में एक सीन जोड़ा जिसमें बताया गया कि चरणदास अपने साथी धोबी के साथ यमराज को चकमा देकर वापस जिंदा होकर पृथ्वी पर आ जाता है।
यह जानकारी कहां पढ़ी थी, याद नहीं लेकिन इतना याद है कि बाल चित्र समिति के पास ज्यादा फंड नहीं था, इसलिए उस दौर में श्याम बेनेगल ने इसे एक लाख में बना लिया था। इसके लिए उन्होंने अविभाजित मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकारों को लिया था। नाचा के श्रेष्ठ कलाकार लालूराम इसमें चरणदास चोर बने थे।
कमेंट
कमेंट X