अगर जाने माने व्यंग्यकार, कवि और साहित्यकार अशोक चक्रधर किसी कृति को साहित्य के लिए ‘बोनस’ बताएं, संवेदन तंत्रिका को झंकृत करने वाला करार दें, उसे प्रमोदक और आज के दौर में सकारात्मकता से भरी हुई कहें तो जाहिर है वह वाकई ‘ज़िंदगी का बोनस’ ही हो सकता है। अशोक चक्रधर जिस तरह हर बात पर चुटकी लेते हैं, उसमें आप समझ नहीं पाते कि सचमुच वो आपकी तारीफ कर रहे हैं या आप पर तंज़ कर रहे हैं। उनका अंदाज़ हर मौके को दिलचस्प बना जाता है। अब बेशक वह मौका किसी किताब के लोकार्पण का हो या फिर कोई और अन्य मंचीय आयोजन।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉ सच्चिदानंद जोशी की नई किताब ‘ज़िंदगी का बोनस’ की कहानियों के बारे में टुकड़े टुकड़े में अशोक चक्रधर ने न सिर्फ अपनी राय दी और उसे लेखक के व्यक्तित्व से जोड़ा बल्कि कई रसीले-चुटीले संदर्भ भी पेश किए। गंभीर से गंभीर बात को हंसते हुए कहना और प्रकाशक की बड़े प्यार से उसकी ‘कंजूसी भरी छपाई’ को लेकर खिंचाई करने की कला में भी अशोक जी कितने माहिर हैं, ये इस आयोजन में नज़र आया।
डॉ सच्चिदानंद जोशी एक बेहतरीन रंगकर्मी रहे हैं, संस्कृति से उनका गहरा नाता रहा है, कविताएं और कहानियां लिखते वक्त उनके भीतर का रंगकर्मी हमेशा मौजूद रहता है। दृश्य जीवंतता के साथ आपके सामने से गुज़रते हुए से लगते हैं। जाहिर है ‘ज़िंदगी का बोनस’ भी उन्होंने यूं ही नहीं लिख दिया। इसकी हर कहानी में उनके अपने अनुभव हैं, वो रिश्ते और संवेदनाएं हैं जो वाकई ज़िंदगी में एक बोनस की तरह उन्होंने हासिल किए हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि उनके साथ, उनकी रचनाओं में तमाम आयामों के साथ उनकी जीवनसंगिनी और रंगकर्मी मालविका जोशी लगातार और ज़रूर मौजूद रहती हैं। शायद वही सच्चिदानंद जोशी के लिए ज़िंदगी का सबसे बड़ा बोनस हैं।
कुछ महीने पहले जब इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में उनसे लंबी बात हुई तो डॉ सच्चिदानंद जोशी ने अपनी किताब भेंट की थी – पल भर की पहचान। छोटी छोटी लेकिन मन के भीतर तक उतर जाने वाली कहानियां। वो तमाम पात्र जो आते जाते उन्हें किसी न किसी तौर पर अपने साथ जोड़ गए, उसे डॉ जोशी ने बेहद खूबसूरती से इस संग्रह में संवेदनशील और दिलचस्प तरीके से पेश किया। उस दौरान उन्होंने बताया कि दंगों की पृष्ठभूमि पर उन्होंने कई कहानियां लिखीं। बहुत सारा वक्त भोपाल में बिताया, एक ऐसे शहर में जो अपनी गंगा जमुनी तहजीब और संस्कृति के लिए जाना जाता है, वहां दंगों का भयानक दौर भी देखा और मन को विचलित करने वाले कई तजुर्बे भी हुए, जिसे उन्होंने अपनी कहानियों में बेहद संवेदनशीलता के साथ उतारा। ‘ज़िंदगी का बोनस’ में भी उनकी कहानी ‘इफ्तार’ मन को भीतर तक झिंझोड़ती है और आज के माहौल में आपको सोचने को मजबूर करती है।
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