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छोटी छोटी कहानियों का बड़ा सा 'बोनस' - ज़िंदगी का बोनस

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अगर जाने माने व्यंग्यकार, कवि और साहित्यकार अशोक चक्रधर किसी कृति को साहित्य के लिए ‘बोनस’ बताएं, संवेदन तंत्रिका को झंकृत करने वाला करार दें, उसे प्रमोदक और आज के दौर में सकारात्मकता से भरी हुई कहें तो जाहिर है वह वाकई ‘ज़िंदगी का बोनस’ ही हो सकता है। अशोक चक्रधर जिस तरह हर बात पर चुटकी लेते हैं, उसमें आप समझ नहीं पाते कि सचमुच वो आपकी तारीफ कर रहे हैं या आप पर तंज़ कर रहे हैं। उनका अंदाज़ हर मौके को दिलचस्प बना जाता है। अब बेशक वह मौका किसी किताब के लोकार्पण का हो या फिर कोई और अन्य मंचीय आयोजन।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉ सच्चिदानंद जोशी की नई किताब ‘ज़िंदगी का बोनस’ की कहानियों के बारे में टुकड़े टुकड़े में अशोक चक्रधर ने न सिर्फ अपनी राय दी और उसे लेखक के व्यक्तित्व से जोड़ा बल्कि कई रसीले-चुटीले संदर्भ भी पेश किए। गंभीर से गंभीर बात को हंसते हुए कहना और प्रकाशक की बड़े प्यार से उसकी ‘कंजूसी भरी छपाई’ को लेकर खिंचाई करने की कला में भी अशोक जी कितने माहिर हैं, ये इस आयोजन में नज़र आया।

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5 वर्ष पहले

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