कई भी देश किसी एक क्षेत्र में अच्छा करके विकास के चरम पर नहीं पहुंच सकता। आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे विकसित देश दुनिया में विकास के हर क्षेत्र में आगे हैं। चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, रक्षा क्षेत्र हो या खेल ही क्यों न हों। जब भी विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), एमनेस्टी इंटरनेशनल या संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई सूची आती है, पश्चिमी देशों का ही बोलबाला रहता है। सवाल उठता है ऐसा क्यों होता है? इसी सवाल का उत्तर ढूंढने की कोशिश पंजाब राज्य में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गुरजोत एस. कालेर अपनी किताब “न्यू इंडिया-द रीयलिटी रिलोडेड” में करते दिखते हैं। अपनी किताब में उन्होंने किसी भी देश के विकास के लिए जरूरी तमाम क्षेत्रों पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। चाहे वह बेरोजगारी की समस्या हो, देश की सुरक्षा की समस्या हो, स्वास्थ्य की समस्या हो, शिक्षा की समस्या हो, भ्रष्टाचार की समस्या हो, बाल विवाह की समस्या हो, किसानों की समस्या हो या आतंकवाद की समस्या हो। इस तरह के लगभग तीन दर्जन से ज्यादा मुद्दों को लेखक ने अपनी किताब में समझाने की कोशिश की है, जिनसे आज भारत जूझ रहा है।
वह लिखते हैं कि आज भले ही भारत की प्रति व्यक्ति आय वित्तीय वर्ष 1951 के 264 रुपये से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2016 में 93,293 रुपये हो गई हो, लेकिन सच्चाई यही है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश गरीबी से जूझ रहा है। इसी तरह जब बात भ्रष्टाचार की आती है, तो भारत ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 2016 में जारी करप्शन परसेप्शन इंडेक्स की 176 देशों की सूची में 79वें स्थान पर था। सूची में पाया गया कि भारत वियतनाम, थाइलैंड, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे देशों से भी पीछे था। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 73 प्रतिशत रिश्वत के मामले कम आय वर्ग के लोगों में बड़े स्तर पर देखने को मिले थे। यही नहीं, विश्व बैंक की 2017 के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स में भी भारत चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे अपने पड़ोसी देशों से पीछे था। सच यही है कि भारत को विकासशील अर्थव्यवस्था से विकसित अर्थव्यवस्था और विश्व स्तर पर एक महाशक्ति का दर्जा प्राप्त करने के लिए इन सभी क्षेत्रों में अच्छा करने की जरूरत है। यह सभी ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें से किसी एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता।
पश्चिमी देशों ने विकास के लिए जरूरी अपने हर क्षेत्र में थोड़ा-थोड़ा अच्छा करने की कोशिश की है। भारत जैसे विकासशील देश पर भी यह बात लागू होती है। अगर भारत अपनी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा केवल स्वास्थ्य पर खर्च करता है, तो शिक्षा का क्षेत्र पीछे रह जाएगा। लेखक गुरजोत एस कालेर अपनी किताब में इन समस्याओं से निपटने के लिए कुछ समाधान भी बताते हैं। देश को गरीबी से बाहर निकालने के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) को बड़ी उम्मीद की नजरों से देखते हैं। यूबीआई को 2017 में वित्त मंत्रालय के आर्थिक सर्वेक्षण में शामिल किया गया था। इस पर व्यापक बहस भी हुई, लेकिन किसी कारण से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
वह लिखते हैं कि पश्चिम के पूंजीवादी मॉडल को अस्वीकार करने का यह ठीक समय है। भारत को अपनी समस्याओं से निपटने के लिए “सामाजिक पूंजीवादी” मॉडल को अपनाने की जरूरत है। लेखक मानते हैं कि यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह सरकारों से इतर देश की समस्याओं से निपटने के लिए खुद से पहल करे। जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा है, “यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह भारत के विकास और उन्नति में भागीदार बने।”
किताब- न्यू इंडिया: द रीयलिटी रिलोडेड
लेखक- गुरजोत एस. कालेर
प्रकाशक- फर्नट्री पब्लिशिंग, चंडीगढ़
मूल्य- 699 रुपये
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