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जनता स्टोर - नए युवा की नई जुबान

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राजनीति में संबंध किस तरह बदलते हैं और कौन, कहां, किसके साथ खड़ा है यह पता करना कितना मुश्किल होता है, इसका सामना पाठक पुस्तक के माध्यम से करता है।

दुनिया एक बाजार है तो इस बाजार में हम सब अपनी-अपनी नैतिकताओं के साथ कभी अकेले, तो कभी भीड़ में खड़े हैं। बाजार ही हमें परखता है। बाजार ही हमें खरे और खोटे का प्रमाणपत्र देता है। बाजार ही हमें ब्रांड बनाता है और बाजार ही हमें बाहर का रास्ता दिखाता है। इसी बाजार में हमारी पढ़ाई है, हमारे संस्थान हैं, हमारे सपने हैं और हमारी राजनीति है। इसी बाजार की तमाम परतों को सामने लाती है ‘जनता स्टोर’। किताब से गुजरते हुए कभी लगता है कि हम सब किसी न किसी तरह की राजनीति से घिरे हैं, तो कभी लगता है कि तमाम अवमूल्यन के बावजूद दोस्ती की ऊष्मा बची हुई है।

इस किताब की कहानी में चार दोस्त हैं, जो यूनिवर्सिटी के छात्र हैं। चार दोस्तों का यह ग्रुप कैसे एक अनचाही लड़ाई के बाद यूनिवर्सिटी के सीनियर छात्र नेताओं के संपर्क में आता है और फिर किस तरह इन युवाओं की सोच बदलती है, घटनाएं बदलती हैं और कुछ सच भी बदलते हैं, इसे जानना दिलचस्प है।

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7 वर्ष पहले

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