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ganga putra a epic is complete moral for human being by rajballabh chaudhary

इस हफ्ते की किताब

पितामह हमेशा राह दिखाते रहेंगे मनुष्य को

amarujala.com-presented by: शरद मिश्र

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महाभारत का सच और उसके चरित्र मानव इतिहास को हमेशा आलोकित करते रहेंगे। हिंदी साहित्य में महाभारत के कालजयी चरित्रों पर रश्मिरथी, कुरूक्षेत्र, जयद्रथ वध और नहुष जैसे काव्य ग्रंथ लिखे गए हैं। लंबे अंतराल के बाद एक और इसी तरह का काव्य ग्रंथ 'गंगापुत्र एक महाकाव्य' आया है। महाभारत की गौरवशाली पंरपरा का पूर्ण निर्वाह करने वाला यह महाकाव्य धीरोदात्त नायक गांगेय यानी गंगा पुत्र भीष्म प‌ितामह पर लिखा गया है। इसमें ‌पितामह के धर्मनिष्ठ होने की, सत्य और सकंल्पनिष्ठ होने की कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है। पूरे ग्रंथ में भाषा सरल और प्रवाहमयी है। काव्य ग्रं‌थ में राजबल्लभ पचौरी एक मंझे हुए साहित्यकार की तरह नजर आते हैं। बड़े चरित्रों के साथ न्याय करना आसान नहीं है।

राजबल्लभ पचौरी ने अपनी भाष्य कला और साहित्यिक समझ से भीष्म पितामह के कठोर चरित्र की पूरी शिद्दत के साथ मीमांसा कर देते हैं। शिक्षा जगत से जुड़ा व्यक्ति हर किसी के साथ एक भाव से पेश आ सकता है। इसी वजह से चौधरी में यह कला है। पूरे ग्रंथ में वह कहीं भी भटकते नहीं हैं। भीष्म पितामह के चरित्र का चित्रांकन करते हुए वह जरा भी शब्दों के हेर फेर में नहीं फंसते हैं। पितामह के चरित्र की तरह  उनकी लेखनी भी अनवरत शाश्वत भाव लिए पूरे ग्रंथ में चलती रहती है। 

गंगापुत्र काव्य ग्रंथ में पितामह के जीवन को इस तरह दर्शाया गया है कि इसके हर अध्याय में मानव समुदाय को उचित परामर्श मिल सकता है। आज के तनाव और भगदड़ भरे माहौल में यह पुस्तक ध्यान और ज्ञान के साथ मेडिटेशन की एक लंबी डोज कही जा सकती है। ऐसी डोज जो आदमी को आत्म मंथन के जरिए वक्त के महाभारत और चक्रव्यूहों से निकलने का गुर देती है। महाभारत हर आदमी के अंदर घटित हो रही है। जीवन का यथार्थ महाभारत है। जीवन का यह समर है। और इसी समर में भीष्म पितामह जैसे व्यक्तित्व निकलते हैं।

पितामह का समूचा जीवन प्रेरणा से भरा है। उनकी प्रतिज्ञा, राजधर्म, त्याग और ईश्वर के प्रति आस्‍था पल पल एक जिज्ञासु मनुष्य को आत्मसंतोष से भर सकती है। आज नेता हर दिन अपना बयान बदलते हैं। लोकतंत्र को शर्मसार करते हैं। ऐसे परिवर्तित वैचारिक माहौल में भीष्म पितामह के जीवन पर लिखी यह कृति जनमानस में वचन और प्रतिज्ञा को एक अहम और गौरवमयी स्‍थान दिलाती है। 

पचौरी ने काव्य ग्रंथ में दर्शन और इतिहास की अपनी व्यापक समझ को इतनी बारीकी के साथ पितामह के चरित्र में उकेरा है कि उसकी उपमा बहुत कम ग्रंथों में मिलेगी। पितामह का दृढ़ संकल्प और असीम ऊर्जा उन्हें इतिहास का उदात्त चरित्र बनाती है। जब भी ऐसे चरित्र का कोई मानसिक रेखांकन करता है तो वह मानव समाज के लिए एक लाजवाब उपहार हो सकता है। ग्रंथ के पूरे सर्ग में पितामह के चरित्र की गहन मीमांसा की गई है। किताब बताती है कि पितामह दरअसल क्या हैं, कैसे उनके चरित्र का निर्माण हुआ और किस तरह वह महाभारत के युद्ध में अपने पोते अर्जुन के हाथों काल कवलित होते हैं?

मैंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी को बड़ी शिद्दत से पढ़ा है। यह काव्यग्रंथ मुझे बहुत अच्छा लगता है। रश्मिरथी से गंगापुत्र काव्य ग्रंथ की मैं तुलना कदापित नहीं करूंगा। दोनों के बीच वक्त का बहुत अंतर है। फिर भी पचौरी के इस प्रयास का मंगलगान अवश्य होना चाहिए। आख़िर उन्होंने कालजयी चरित्र पितामह पर अपनी सोच और ऊर्जा को शब्दों का रूप देने का अनुपम साहस तो किया है। राजबल्लभ पचौरी की यह कोशिश स्तुत्य है। पूरे ग्रंथ में वह पितामह के चरित्र से इंच मात्र भी अलग नहीं होते हैं। 
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