इतिहास कभी दृष्टि और विचारों में नहीं बंधा। घटनाओं में कैद नहीं हुआ और झूठे-सच्चे तथ्यों में नहीं फंसा। लेकिन इस समय में इतिहास वॉट्सएप्प में बंद है। सोशल मीडिया पर तैर रहा है और वीडियो में वायरल हो रहा है। इतिहास अपने समय से बाहर है और हर उस रंग में है, जिसमें व्यक्ति-समूह और संस्थाएं उसे रचना चाहती हैं। इतिहास, इतिहास ना होकर एक आख्यान और मिथ की तरह हमारे आसपास फैलाया जा रहा है और हर एक आम और खास उसके इस्तेमाल के लिए अपनी तरह से कहानी रच रहा है।
दरअसल, मानव सभ्यता के इतिहास में इतिहास को लेकर हर व्यक्ति, विचार और दुनिया का नजरिया हमेशा समय सापेक्ष रहा है। इतिहास कभी झूठ के पुलिंदे के रूप में गिना गया, तो कभी घटनाओं के रंग को बदल देने वाली ताकत के तौर पर। नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था- इतिहास,असत्यों पर एकत्र की गई सहमति है। यकीनन यह वही दौर है जहां कई असत्य मिलकर एक सत्य रचने की कोशिश कर रहे हैं। उन घटनाओं से अपने हिस्से का इतिहास बना रहे हैं जिनका जन्म ही संदेह के घेरे में हुआ। एक ऐसी कवायद की जा रही है जिससे सामूहिक सर्वसम्मति का इतिहास रचा जा सके। ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं जिससे इतिहास को बदला जा सके।
बहरहाल, इतिहास केवल बीते हुए समय का लेखा-जोखा नहीं है और ना ही सत्य, असत्य और तथ्यहीन घटनाओं का एक क्रम, जो समय के सामानांतर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। इतिहास बीती हुई गलतियों को सुधारने, उनसे सीख लेने और वर्तमान को इतिहास में दर्ज नहीं होने देने का उपक्रम भी है।
इतिहास को हमने अब तक राजा-रानी की कहानियों और कुछ घटनाओं का दस्तावेज भर माना है, लेकिन कभी जनता के बीच उपस्थित उस समय के रूप में दर्ज नहीं किया, जिसके भीतर मानव जीवन के संघर्ष, जिजीविषा और अस्तित्व के बचे की रहने की दास्तानें दर्ज हैं। जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा था- मूल्यों की स्थापना का यह इतिहास ही यथार्थ में मानव जाति का इतिहास है। इतिहास कुछ भी नहीं करता। उसके पास आपार धन नहीं होता, वो लड़ियां नहीं लड़ता। वो तो मनुष्य हैं, वास्तविक, जीवित, जो ये सब करते हैं।
विष्णु शर्मा इतिहास से एम.फिल. हैं और नेट भी क्वालीफाई कर चुके हैं।PC: Social Media
दरअसल, बीते एक दशक में इतिहास पर कई तरह की व्याख्याएं, विमर्श और परिभाषाएं निकलकर सामने आईं हैं, जिसने इतिहास के मूल पर चोट पहुंचाई है। उसके ढांचे को बदलने की कोशिश की है। घटनाओं को अपने रंग से रंगकर ऐसी तस्वीरें बनाईं हैं जिसने इस आभासीय समय में उसकी वैसी ही छवि कैद की है जैसी दिखाई गई है। लेकिन एतिहासिक तथ्यों, घटनाओं और कहानियों को तोड़ने-मोड़ने के दौर में एक इतिहास ऐसा भी शेष है जो इस वायरल समय से इतर अपनी असली छवि को लिए बैठा है और उस सच को बाहर लाने की कोशिश की है लेखक और पत्रकार विष्णु शर्मा ने।
विष्णु शर्मा इतिहास से एम.फिल. हैं और नेट भी क्वालीफाई कर चुके हैं। इतिहास के विद्यार्थी, शोधार्थी और एक दशक से ज्यादा मुख्यधारा की पत्रकारिता में रहे विष्णु शर्मा ने इतिहास के भीतर एक ऐसा हस्तक्षेप करने की कोशिश की है, जो उसके भीतर समाहित झूठ, भ्रम और तथ्यहीन घटनाओं का पर्दाफाश करती है।
उनकी किताब "इतिहास के 50 वायरल सच" उन झूठे ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल करती है, जो सच बनकर वायरल हो गए। उन ट्विटर हैंडल, फेसबुक एकाउंट की मंशा को सामने लाती है, जिसने इतिहास के भीतर अपनी टॉर्च से सेंधमारी की और आम जनमानस को इतिहास उसी रौशनी में दिखाया जो वे दिखाना चाहते थे।
मध्यकाल से लेकर आधुनिक इतिहास के तमाम सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों को समेटती इस किताब में 50 ऐसे चैप्टर हैं जिनके शीर्षक ही आपको पूरी किताब को पढ़ने के लिए मजबूर कर देंगे। ये ऐसे इतिहास का लेखा-जोखा है जिन्हें किस्सागोई की शक्ल में विशेष उद्देश्य के तहत फैलाया गया। विष्णु उन्हीं कहानियों के पीछे छिपे असली कथानक, भूमिका, चरित्रों, घटनाक्रम, प्रसंग, संदर्भ को सामने लाते हैं जो वास्तव में घटित हुए।
किताब का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और उसके महत्वपूर्ण नायकों पर केंद्रित है।PC: Social Media
किताब का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और उसके महत्वपूर्ण नायकों पर केंद्रित है। इस हिस्से में भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण नायकों और उनके साथ घटित घटनाओं के भीतर मौजूद ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर फोकस है। बतौर पत्रकार विष्णु की नजर उन घटनाओं पर रही है, जो इतिहास को बदलने, उसे अपने हिसाब से मोड़ने और एक पहले से मौजूद पक्ष को ध्वस्त करने का काम करती है।
किताब में आपको बहादुर शाह जफर, से लेकर नेहरू, गांधी, भगत सिंह, इंदिरा गांधी और यहां तक की अंग्रेज वायसरायों के जीवन से जुड़ी उन अहम बातों को भी साझा किया है जो बात-बेबात और बिना प्रसंग के सोशल मीडिया विशेष रूप से वॉट्सएप्प के जरिये हमारे आसपास फैलती रही है और एक नया इतिहास बुनती रही है।
दरअसल, इस किताब में उन पटकथाओं के प्रतिनिधित्व करते हिस्से हैं, जिनके नाम पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ज्ञात-अज्ञात रास्तों से इतिहास को बदनाम करने के प्रयास किए गए। वह बताया गया जो नहीं था। वह पेश किया गया जो घटा नहीं। घटनाओं के मंतव्य बदले गए और उन्हें संदर्भों के अनुसार विचारधारा विशेष के रास्ते फैलाया गया।
अपनी पहली पुस्तक गुमनाम नायकों की गौरवशाली गाथाएं लिखकर लेखक विष्णु शर्मा ने इतिहास के प्रति अपनी स्प्ष्ट, पारदर्शी और निष्पक्ष दूरदृष्टि को सामने रखा है। ये किताब अपनी तरह की पहली अनोखी किताब थी जो पहले पहले पहले ब्लॉग्स के रूप में प्रतिष्ठित वेबसाइट पर सामने आई और पाठकीय दबाव के चलते किताब बन गई।
फिलहाल, प्रभात प्रकाशन से आ रही उनकी दूसरी किताब बतौर इतिहास के विद्यार्थी इतिहास के उस पक्ष को समझने की चेष्टा है जिसे एक पत्रकार देख रहा है। चूंकि विष्णु इतिहास के छात्र रहे हैं और पेशे से पत्रकार भी हैं ऐसे में उनकी यह किताब किसी वैचारिक खेमेबंदी से बाहर भी है। यहां एक शोधार्थी है, एक लेखक है और एक निष्पक्ष पत्रकार भी है जो इतिहास को ठीक वैसे ही पेश कर रहा है जैसा वह है।
विष्णु इस किताब के लिए बधाई के पात्र हैं, क्योंकि ऐसी किताबें आने वाले समय में इतिहास के सच को जलाकर फैलाई गई वैचारिक धुंध को छांटने का काम करती है जो प्रदूषण बनकर इस समय की आबोहवाको खराब कर रही है। पीढ़ियों के दिलो-दिमाग में जहर घोल रही है। इतिहास के ये वायरल सच जितने फैलेंगे उतना कोहरा छंटेगा और सच की उजास फैलेगी।
इस अंधियारे में इतिहास को देखने की नई रौशनी देने के लिए विष्णु को बधाई..!
पुस्तक: इतिहास के 50 वायरल सच
मूल्य : 400 रुपये
लेखक: विष्णु शर्मा
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, दिल्ली।
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7 वर्ष पहले
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