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"इतिहास के 50 वायरल सच": सोशल मीडिया में कैद इतिहास की पड़ताल

इतिहास के 50 वायरल सच प्रभात प्रकाशन से आई है।
                
                                                         
                            
इतिहास कभी दृष्टि और विचारों में नहीं बंधा। घटनाओं में कैद नहीं हुआ और झूठे-सच्चे तथ्यों में नहीं फंसा। लेकिन इस समय में इतिहास वॉट्सएप्प में बंद है। सोशल मीडिया पर तैर रहा है और वीडियो में वायरल हो रहा है। इतिहास अपने समय से बाहर है और हर उस रंग में है, जिसमें व्यक्ति-समूह और संस्थाएं उसे रचना चाहती हैं। इतिहास, इतिहास ना होकर एक आख्यान और मिथ की तरह हमारे आसपास फैलाया जा रहा है और हर एक आम और खास उसके इस्तेमाल के लिए अपनी तरह से कहानी रच रहा है।

दरअसल, मानव सभ्यता के इतिहास में इतिहास को लेकर हर व्यक्ति, विचार और दुनिया का नजरिया हमेशा समय सापेक्ष रहा है। इतिहास कभी झूठ के पुलिंदे के रूप में गिना गया, तो कभी घटनाओं के रंग को बदल देने वाली ताकत के तौर पर। नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था- इतिहास,असत्यों पर एकत्र की गई सहमति है।  यकीनन यह वही दौर है जहां कई असत्य मिलकर एक सत्य रचने की कोशिश कर रहे हैं। उन घटनाओं से अपने हिस्से का इतिहास बना रहे हैं जिनका जन्म ही संदेह के घेरे में हुआ। एक ऐसी कवायद की जा रही है जिससे सामूहिक सर्वसम्मति का इतिहास रचा जा सके। ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं जिससे इतिहास को बदला जा सके। 

बहरहाल, इतिहास केवल बीते हुए समय का लेखा-जोखा नहीं है और ना ही सत्य, असत्य और तथ्यहीन घटनाओं का एक क्रम, जो समय के सामानांतर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। इतिहास बीती हुई गलतियों को सुधारने, उनसे सीख लेने और वर्तमान को इतिहास में दर्ज नहीं होने देने का उपक्रम भी है।

इतिहास को हमने अब तक राजा-रानी की कहानियों और कुछ घटनाओं का दस्तावेज भर माना है, लेकिन कभी जनता के बीच उपस्थित उस समय के रूप में दर्ज नहीं किया, जिसके भीतर मानव जीवन के संघर्ष, जिजीविषा और अस्तित्व के बचे की रहने की दास्तानें दर्ज हैं। जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा था-  मूल्यों की स्थापना का यह इतिहास ही यथार्थ में मानव जाति का इतिहास है। इतिहास कुछ भी नहीं करता। उसके पास आपार धन नहीं होता, वो लड़ियां नहीं लड़ता। वो तो मनुष्य हैं, वास्तविक, जीवित, जो ये सब करते हैं।

विष्णु शर्मा इतिहास से एम.फिल. हैं और नेट भी क्वालीफाई कर चुके हैं।PC: Social Media

दरअसल, बीते एक दशक में इतिहास पर कई तरह की व्याख्याएं, विमर्श और परिभाषाएं निकलकर सामने आईं हैं, जिसने इतिहास के मूल पर चोट पहुंचाई है। उसके ढांचे को बदलने की कोशिश की है। घटनाओं को अपने रंग से रंगकर ऐसी तस्वीरें बनाईं हैं जिसने इस आभासीय समय में उसकी वैसी ही छवि कैद की है जैसी दिखाई गई है।  लेकिन एतिहासिक तथ्यों, घटनाओं और कहानियों को तोड़ने-मोड़ने के दौर में एक इतिहास ऐसा भी शेष है जो इस वायरल समय से इतर अपनी असली छवि को लिए बैठा है और उस सच को बाहर लाने की कोशिश की है लेखक और पत्रकार विष्णु शर्मा ने।  

विष्णु शर्मा इतिहास से एम.फिल. हैं और नेट भी क्वालीफाई कर चुके हैं। इतिहास के विद्यार्थी, शोधार्थी और एक दशक से ज्यादा मुख्यधारा की पत्रकारिता में रहे विष्णु शर्मा ने इतिहास के भीतर एक ऐसा हस्तक्षेप करने की कोशिश की है, जो उसके भीतर समाहित झूठ, भ्रम और तथ्यहीन घटनाओं का पर्दाफाश करती है।

उनकी किताब "इतिहास के 50 वायरल सच" उन झूठे ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल करती है, जो सच बनकर वायरल हो गए। उन ट्विटर हैंडल, फेसबुक एकाउंट की मंशा को सामने लाती है, जिसने इतिहास के भीतर अपनी टॉर्च से सेंधमारी की और आम जनमानस को इतिहास उसी रौशनी में दिखाया जो वे दिखाना चाहते थे। 

मध्यकाल से लेकर आधुनिक इतिहास के तमाम सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों को समेटती इस किताब में 50 ऐसे चैप्टर हैं जिनके शीर्षक ही आपको पूरी किताब को पढ़ने के लिए मजबूर कर देंगे। ये ऐसे इतिहास का लेखा-जोखा है जिन्हें किस्सागोई की शक्ल में विशेष उद्देश्य के तहत फैलाया गया। विष्णु उन्हीं कहानियों के पीछे छिपे असली कथानक, भूमिका, चरित्रों, घटनाक्रम, प्रसंग, संदर्भ को सामने लाते हैं जो वास्तव में घटित हुए। 
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7 वर्ष पहले

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