दुनिया रोज ब रोज बदल रही है और इधर तो कुछ ज्यादा ही। इस बदलती दुनिया के बारे में कल लोग लिखेंगे कि कैसा दौर था आज का कि हम एक दूसरे से दो गज की दूरी बना कर रखते थे। कोराना ने सारी दुनिया को तबाह कर रखा था। सारे कामकाज ठप कर अपने अपने घरों में कैद रह कर भी हम इस अदृश्य दुश्मन से पार नहीं पा सके। पूरी दुनिया एक अदने से वायरस के आगे ठप पड़ गयी थी।
सारे हथियार, अस्त्र-शस्त्र और बड़े देशों की बंदरघुड़कियों की एक न चली इस निरंकुश वायरस पर। इस दौर को देखें तो बचपन का अनुभव याद आता है। अंधेरे में राह चलते कोई पत्ता भी खड़कता तो हम हनुमान चालीसा पढ़ने लगते थे। जैसे हनुमान जी संकट से बचा लेंगे। आज कोरोना को आए 6-7 महीने होने को आए। लोग घरों में कैद हैं, बच्चे आन लाइन पढ़ रहे हैं। कवियों के कारोबार बंद हैं। न कवि सम्मेलन, न सेमिनार, न लिफाफे।
न स्कूल न काॅलेज, यह भी दिन देखना था। पर आज देखें तो फेसबुक, यूट्यूब और सोशल मीडिया पर लेखकों कवियों की दहाड़ सुनाई दे रही है। वे कोरोना से आर पार लड़ाई के मूड में आ गए हैं। ऑनलाइन आने की सुविधा ने सबको कवि बना दिया है, सबको विमर्शकार। सारी दुनिया इंटरनेट की मुट्ठी में है और दुनिया कोरोना की मुट्ठी में। क्या अजब आलम और दृश्य है। ऐसे में हमारे समय के हास्य और व्यंग्य के शिरोमणि कवि अशोक चक्रधर जी किस मुद्रा में हैं यह देखना समीचीन होगा। पर यहां तो सदैव की तरह अशोक चक्रधर ठहाका लगाते हए नजर आ रहे हैं और यह दुहराते हुए कि-
हार में ना जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं।
पर मुझे पता है कवि अपने भय का पता नहीं लगने देते। लाख जगूड़ी कहें, भय भी शक्ति देता है पर भय से इन दिनों लेखकों कवियों की बोलती बंद है। कविता तो कैसी निकलेगी मुंह से इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। पर फिर भी ऐसे भयावह वातावरण में भी हास्य एवं व्यंग्य के पुरोधा कवि अशोक चक्रधर अपना काव्य ' गई दुनिया नई दुनिया' लेकर आए हैं जिससे गुजरते हुए सकारात्मक विद्युत शक्ति जैसी महसूस होती है। अशोक जी विवेकी व्यक्ति हैं। धीरज न खोने वाले। कवि हैं तो आर पार देखने की क्षमता भी रखते हैं। वे मरते हुए व्यक्ति को भी हास्य की कविता सुना दें तो किसी अंग- उपांग में प्राण बचे हों तो लौट आएं।
माना कि संसार मर रहा है, परेशान हैं पर परेशानहाल दुनिया को और परेशान करना या उसके सामने मर्सिया पढ़ना अशोक जी की फितरत में कभी नहीं रहा। वे जीवन के कवि हैं, हास परिहास के कवि हैं, वे विट के कवि हैं, ह्यूमर के कवि हैं, वे प्रेरणा के कवि हैं, उदभावना और संभावना के कवि हैं, जीवन के कवि हैं। तभी तो वे कह रहे हैं कि गयी दुनिया अब नई दुनिया है मास्क वाली, दो गज दूरी वाली, व्यर्थ बाजार कस्बे में न टहलने वाली, कवियों के लिए भी ये अज्ञातवास के दिन हैं तो भइया वहीं रहो कृपा करके। तालियां इंटरनेट पर भी खूब मिलेंगी। अब यह नई दुनिया है।
सो कवियों ने घर को ही सम्मेलन का मंच बना लिया है, घर, घर नहीं, स्टुडियो बन गया है। यह नई दुनिया है। कोरोना की मार से मनुष्य को भी बचना है, कवि को भी, दुनिया को भी। कोरोना से न याराना न बिरादराना कोई संबंध नहीं रखना। उसे दूर रखना है। ऐसे में कवि का रसायन ही काम देता है। पांच महीने से घर पर पड़ जाइये तो घर में ही जीना दूभर हो जाता है कौन नहीं जानता। पर यह ऐसी दुनिया है कि घर में ही रहने में भलाई है। अशोक चक्रधर की कविता इन घरघुसरे लोगों के लिए जीवन का रसायन है।
ऐसी ही सकारात्मक बातों को अपने स्फुट हास्य व्यंग्य में पिरोया है अशोक चक्रधर जी ने अपने नए काव्य गई दुनिया नई दुनिया में । कभी दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय लिख कर हिंदी की दुनिया में हलचल मचा दी थी। अब उसे नए अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं अशोक च्रक्रधर जी --संस- कृति के चार अध्याय। संस यानी बतर्ज श्यामलाल एंड संस। इस अनूठे काव्य में ऐसी बहुतेरी कविताएं हैं जो किस्सागोई के अंदाज में हैं जिन्हें पढ़ते हुए आप के भू-गर्भीय हिस्से में हलचल हो सकती हैं; बत्तीसी मुक्त भाव से मुक्त थियेटर के अंदाज में परिणत हो सकती है।
यही अशोक जी का जादू है। वे मंच पर हों तो तुकांत, उपमेय उपमान और उत्प्रेक्षाओं से खेलते हैं, घर में हों, तो तमाम शौकों से घिरे रहते हैं। मुझे लगता है अज्ञेय की तरह उन्हें भी भांति भांति के शौक होंगे। तमाम कलाओं में उनकी पैठ होगी। वे गुनगुनाते भी क्या मधुर अंदाज में होंगे। गीतकारों से घिरे जो रहते हैं।
''गई दुनिया नई दुनिया'' हाल ही में प्रलेक प्रकाशन से छप कर आई है। दो सौ पेज की कविताओं की पुस्तक । लोगों में जीवन का संचार भरती हुई। सत्तावन कविताओं की इस पुस्तक में संस-कृति के चार अध्याय के अलावा कई कविताएं ध्यातव्य हैं ।
यथा, घर जाते मजदूर, मेढकों का काफिला, दूसरे लाक डाउन पर, दशरथ माझी और दाना माझी, सबकी है ये धरती, हैपिटाइटिस , नोम तोम का ताजमहल, सुख दुख का मीत है, माई री माई एफडीआई, वेदना में नहीं संवेदना में कमी, टीन और कोरंटीन, मेरा नाम इच्छा शक्ति है, बाप रे बाप रे बाप रे, धीरज क्यों खो रहे हैं, सूर्योदय ही बनाकर मानूंगा, यहीं बजना है जीवन संगीत, चुल्लू वाला उल्लू बनाता है, दुनिया नई बनानी है, आदि।
वे पुस्तक की प्रस्तावना में कहते हैं यह कोरोना संक्रमण काल है, आगे चल कर इसे पूर्व कोरोना काल व उत्तर कोरोना काल कहा जाएगा। वे कहते हैं समझिए ये तीसरा विश्वयुद्ध चल रहा है। लड़ाई एक अदना वायरस से है, आदमी सन्न है और प्रकृति प्रसन्न है। यह कोरोना सभ्यता का दौर है। लोग पहले तो घर में कैद होने पर छटपटाते थे अब पिंजरे के तोते की तरह कैद रहने में ही भलाई समझने लगे हैं।
अशोक जी ऐसे घर कैदियों के लिए ही जीवन संदेश देते हैं। दिवंगत चित्रकार मित्र मिकी पटेल के मजाहिया रेखांकनों से सजी यह पुस्तक संकट काल में राहत देने वाली संवेदना से लैस है। यों भी अशोक चक्रधर जी जहां हो वहां विषाणुओं के लिए उनकी वाणी लोबान सा काम करती है। वे खुद सत्तर के आसपास है पर जीवनी शक्ति युवाओं जैसी। संस-कृति के चार अध्याय, श्यामलाल एंड संस के कारनामों की कहानी है बहुत ही रोचक व दिलचस्प ।
इसे पढ़ते हुए ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य आख्यान हम न मरब की कहानी याद हो आई। श्यामलाल कैसे कोरोना संकट से बच कर वापसआते हैं इसकी एक साहसिक और लोमहर्षक दास्तान लिखी है अशोक जी ने। यह एक उपन्यासिका की पीठिका भी हो सकती है। यह कविता कवि के शब्दों में यह सीख भी देती है कि -
प्रकृति नहीं सहती कोई अन्याय
अति हो जाती है तो आता है
नया अध्याय ।
'नन्हीं सचाई' बहुत करुण कविता है जिसमें बच्ची के भोलेपन को अशोक जी ने बारीकी से पकड़ा है। दूसरे लाॅकडाउन के बाद आपदा प्रबंधन की बेहतरीन कविता है। क्रमश: क्या करना क्या नहीं करना। बातरतीब उपचार की कविता। हम कह सकते हैं कि कविता यदि आत्मा के उपचार की औषधि है तो यह कविता दैहिक उपचार की औषधि है।
कोराना के साथ जीने ही जीवन शैली बताती हुई अनेक कविताएं यहां हैं। दशरथ माझी ने पत्नी के उपचार के लिए अस्पताल जाने आने के लिए पहाड़ को काट कर रास्ता बनाने का असंभव कार्य किया था, अशोक जी की कविता दशरथ माझी के साहस की दास्तान है।
'सबकी है ये धरती' शिक्षाप्रद कविता है। सीख देती है संकट से निपटने की। 'नोम तोम का ताजमहल' कविता का तो कहना ही क्या। गाइड नोम तोम की भाषा में पूरे ताजमहल के इतिहास ओर अतीत को पुरलुत्फ अंदाज में बयां कर देना आसान नहीं है।
वे ऐसा करते हैं कि पूरी ताजमहल की तस्वीर सामने घूम जाती है हम बिना गए ताजमहल की सैर पर निकल जाते हैं। स्विस बैंक काला धन का आगार है लोग कहते है, 'स्विस कल्याणी की एक बंदिश' इसी धारणा का गौरवगान है।
अशोक जी के पोर पोर में हास्य भरा है, विट भरा है, हाजिरजवाबी भरी है। पर वे सदैव हँसते ही नहीं रोते ओर रुलाते भी हैं। भाभी के जन्मदिन पर बहुत कारुणिक कविता लिखी हैं उन्होंने यहां तो ''दुख सुख का मीत है'' लिख कर दुख ओर सुख दोनों संगी साथियों की सदियों की मैत्री पर मुहर भी लगाई है।
बाप रे बाप रे बाप रे तो कितनी सधी हुई ग़ज़ल की तरह है हास्य के रैपर में पर इस माध्यम से जीवन और समय की सचाई बयान की है अशोक जी ने। निगमबोध से लेकर अनन्य जीवन बोध तक के अहसास को अशोक जी ने काव्यात्मक लहजे में सामने रखा है । अंत में जिस कविता में मेरा ध्यान अंटका वह कितनी मासूम सी है-
गोदाम भरे पडे़ हैं
लोग बाहर भी मरे पड़े हैं
सफाईकर्मी लाशों को कूड़े की तरह ढो रहा है
हे भगवान ये क्या हो रहा है
भगवान बड़ी मुश्किल से अपने अधर खोले
और कराहते हुए बोले यह दृश्य मेरी फिल्म से निकाल दो
फिलहाल दो बूंद गंगाजल मेरे मुंह में भी डाल दो
मुझे याद है मारीशस में आयोजित विगत विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर यहां के मोर और मारीशस के राष्ट्रीय पक्षी डोडो को लेकर जो लालित्यपूर्ण गीत उन्होंने लिखा था वह अदभुत सांस्कृतिक समरसता और दोनों देशों की आत्मीयता का प्रतीक बन गया। उसके बोल थे -- भारत का है मोर और है मारीशस की डोडो/ आ गई आ गई, सतरंगी माटी से आ गई डोडो। इसी क्रम में भोपाल से मारीशस नामक पुस्तक में अंत में शामिल संकल्प गीत की ये पंक्तियां अशोक जी के दृढनिश्चयी व्यक्तित्व की परिचायक हैं -
मंजिल हो जाय परास्त
गतिमान प्रगति का चक्का हो
अनकिया सभी पूरा हो, यदि
संकल्प हमारा पक्का हो।
आज कोरोना संकट शिखर पर है। हम भरे कोरोना से उपचार कर लाखों लोगों को ठीक भी कर पा रहे हैं पर याद रहे गिरिजा कुमार माथुर ने लिखा था, आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना। इस प्रारंभिक जीत पर हमें इतराना नहीं बल्कि सावधान रहना है और संकल्पजयी बन कर कोरोना को मात देना है। 'गई दुनिया नई दुनिया' इसी नई मानवीय सभ्यता का प्रस्तावन है, संदेश है।
(लेखक हिंदी के सुधी कवि समालोचक एवं भाषाविद हैं।)
आगे पढ़ें
6 वर्ष पहले
कमेंट
कमेंट X