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कवि और राजनयिक अभय के. ने 'हनुमान चालीसा' का सिर्फ अनुवाद करना नहीं किया बल्कि मूल रचना की ऊर्जा को बनाए रखा

पुस्तक समीक्षा
                
                                                         
                            कवि और राजनयिक अभय के. ने  ‘द हनुमान चालीसा’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। तुलसीदास की अवधी में रची गई यह स्तुति असाधारण रूप से संक्षिप्त है—आरंभ और समापन के दोहों के बीच चालीस चौपाइयाँ। अभय ने इन कुछ मिनटों के पाठ को 108 पृष्ठों की एक सुंदर पुस्तक का रूप दिया है। उन्होंने प्रत्येक पद तक पहुँचने के चार रास्ते दिए हैं—मूल देवनागरी पाठ, रोमन लिप्यांतरण, व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ और तुकांत अंग्रेज़ी रूपांतरण।
                                                                 
                            

यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उदारता है। जो पाठक अवधी से परिचित नहीं हैं या देवनागरी नहीं पढ़ सकते, उनसे यह अपेक्षा नहीं की गई कि वे इस परंपरा के बाहर खड़े रहें। साथ ही, अंग्रेज़ी मूल को विस्थापित भी नहीं करती। तुलसीदास अपनी पूरी गरिमा के साथ उपस्थित हैं; अभय केवल उनकी ओर जाने वाला एक पुल बनाते हैं।

अभय बताते हैं कि इस पुल की शुरुआत त्रिनिदाद और टोबैगो से आए एक प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई। विदेश में पीढ़ियां गुजरने के साथ भारत से उनका भाषाई संबंध कमजोर पड़ गया था, लेकिन आध्यात्मिक जुड़ाव अब भी कायम था। वे चाहते थे कि कोई ऐसा पवित्र ग्रंथ अंग्रेज़ी में उपलब्ध हो, जिसकी भाषा सहज हो—न कि बोझिल और अकादमिक—बल्कि ऐसी जिसे वे समझ सकें, याद कर सकें और संगीत के साथ गा सकें।

अभय, जो बचपन से हनुमान चालीसा का पाठ करते आए हैं और संकट के समय उसकी ओर लौटते रहे हैं, इस आवश्यकता और इसकी चुनौती—दोनों को समझते थे।

उनका उद्देश्य केवल अर्थ का अनुवाद करना नहीं था, बल्कि मूल रचना की ऊर्जा, गति और लय को भी बचाए रखना था। यह एक बेहद कठिन काम है। तुलसीदास की सहज तुक और प्रवाह जैसी स्वाभाविकता अंग्रेज़ी में हर जगह संभव नहीं हो सकती; कई बार संगीत को बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ी को अपने स्वाभाविक ढाँचे से थोड़ा हटना पड़ता है। लेकिन यही इस प्रयास की ईमानदारी भी है। अभय ने शब्दशः, नीरस और निर्जीव अनुवाद की सुरक्षित राह चुनने के बजाय गाए जा सकने वाले काव्य का जोखिम उठाया है।

पुस्तक की व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ अक्सर इस स्तुति में प्रवेश का सबसे समृद्ध रास्ता बन जाती हैं। इनमें हनुमान जी केवल लोकप्रिय चित्रों में दिखाई देने वाले बलशाली देवता नहीं हैं, बल्कि विद्वान, संदेशवाहक, मध्यस्थ और आदर्श भक्त के रूप में सामने आते हैं। उनकी शक्ति में अहंकार नहीं है। उनकी बुद्धि दूसरों की सेवा में लगती है। वे सीता के सामने स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म बना सकते हैं और लंका के सामने विकराल रूप धारण कर सकते हैं—अर्थात विनम्रता और धर्मसम्मत शक्ति एक ही व्यक्तित्व में साथ-साथ मौजूद हैं।
3 hours ago

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