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अ रूरल मैनिफेस्टो: ग्रामीण भारत का घोषणापत्र

a rural manifesto book review in hindi
                
                                                         
                            

यह किताब ऐसे समय आई है, जब किसानों का मुद्दा विमर्श में है। क्या राजनीतिक दल उनके इस रूरल मैनिफेस्टो पर गौर करेंगे?

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के धनावा गांव के एक किसान राम सहाय की गेहूं की पचास फीसदी फसल ओलावृष्टि में बर्बाद हो गई, जिससे उनके दो लाख रुपये डूब गए। उन पर साढ़े तीन लाख रुपये का कर्ज पहले से था और उन्हें इस नुकसान के एवज में सिर्फ पांच हजार रुपये का मुआवजा मिलने की संभावना थी! यह व्यथा सिर्फ राम सहाय की नहीं है, बल्कि मार्च, 2017 में 14 राज्यों के लाखों किसानों की 85 लाख हेक्टेयर में बोई गई खरीफ की फसल तबाह हो गई। यह कथा बार-बार दोहराई जा रही है। सुल्तानपुर के सांसद और इन दिनों भाजपा की मुख्यधारा की राजनीति से अलग-थलग वरुण गांधी किसानों के मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील हैं और लगातार उन पर अखबारों में लिख रहे हैं। ऐसे समय जब 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले पांच राज्यों के चुनाव हो रहे थे, वरुण गांधी ग्रामीण भारत की दशा पर एक वृहत ग्रंथ की तैयारी में जुटे थे। ‘अ रूरल मैनिफेस्टो : रियलाइजिंग इंडियाज फ्यूचर थ्रू हर विलेजेस’, ग्रामीण भारत पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें राम सहाय जैसे तमाम किसानों की कहानियां तो दर्ज हैं ही, इसमें ग्रामीण भारत के लिए बनाई गईं नीतियों और कार्यक्रमों का गहराई से जायजा लिया गया है। ध्यान रहे, वरुण की पहचान कोई अर्थशास्त्री या कृषि विशेषज्ञ की नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने इतना भारी भरकम ग्रंथ लिखने की जहमत क्यों उठाई? तो इसका जवाब वह इस तरह से देते हैं, 'इस वृहत कोष, बल्कि तथ्यों और आकलनों के इस सघन संकलन का विचार मेरे मन में तब आया, जब मैं भारत के सुदूर देहातों में भ्रमण कर रहा था।' उन्होंने ग्रामीण भारत के जमीनी मुद्दों का गहराई से शोध किया है, जिनमें कभी न खत्म होने वाले पलायन से लेकर किसानों के कर्ज और उनकी आय के मुद्दे शामिल हैं। वह सरकारी रिपोर्ट्स की पड़ताल करते हुए पाते हैं कि देश में औसत लैंड होल्डिंग 1971 के 2.3 हेक्टेयर से घटकर 2011 में 1.16 हेक्टेयर रह गई!

दरअसल, छोटे और सीमांत किसानों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। उनके लिए खेती करना कितना मुश्किल हो गया है, यह इससे पता चलता है कि वह महंगे ट्रैक्टर तो ले नहीं सकते, मगर यदि वह बैल जोड़ी किराए पर भी लें, तो वह पांच सौ रुपये रोजाना पर मिलते हैं! वह लिखते हैं कि यदि पांच सदस्यों वाले एक बीपीएल परिवार की कल्पना करें, जिनकी दैनिक आय 33 रुपये है, तो एक गैस सिलेंडर की कीमत पांच सौ रुपये होगी और उनकी मासिक आय का दस फीसदी सिर्फ ईंधन पर खर्च हो जाएगा, जिससे वे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले वैकल्पिक ईंधन का सहारा ले सकते हैं। वरुण गांधी की यह किताब ऐसे समय आई है, जब किसानों का मुद्दा विमर्श में है। ऐसे समय जब अगले लोकसभा चुनाव से पहले संसद का आखिरी पूर्ण सत्र चल रहा है, क्या राजनीतक दल उनके इस रूरल मैनिफेस्टो पर गौर करेंगे?


सप्ताह की किताबें
किताब- अ रूरल मैनिफेस्टो
लेखक-  फिरोज वरुण गांधी
प्रकाशक- रूपा प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- 995 रुपये

7 वर्ष पहले

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