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थाप (पहली किताब) - मनीष यादव - सुधारगृह की मालकिनें
खुद के प्रति मौन - मैंने उन स्त्रियों के लिए कविताएं लिखीं, जो अक्सर संघर्ष करती हैं, लेकिन खुद के प्रति मौन रहती हैं। परंपराओं का विरोध नहीं कर पाती हैं, उनके लिए एक आवाज बनने का प्रयास किया है। ‘सुधारगृह की मालकिनें’ में आपको बहुत सारी कविताएं दिखेंंगी, उन सभी मांओं के लिए, जो मां होने के अलावा बहुत कुछ होना चाहती रहीं।
श्रेष्ठ अनुवाद - भाषाबंधु - सुजाता शिवेन- चरु चीवर और चर्या (मूल ओड़िया)
जीवंतता की बड़ी चुनौती- अनुवाद एक ऐसा काम है, जो कृति के भीतर उतरकर उसे दूसरी भाषा में जीवंत कर देने की चुनौती देता है। प्रदीप दाश का यह ओड़िया उपन्यास एक बहुसम्मानित कृति है, जिसे हिंदी में प्रस्तुत करना एक चुनौती थी। मैंने इसे स्वीकार करके ओड़िया और हिंदी के बीच एक सशक्त सेतु बनाने की हरसंभव कोशिश की है।
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