यूरोप के एक देश ने जहां दुनिया को एक भाषा सिखाई, अब वहीं पर कुछ प्रवासी भारतीय हिंदी भाषा को दुनियाभर में फैलाने का काम कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं ब्रिटेन की, जहां पर इन दिनों हिंदी का खूब प्रचार-प्रसार हो रहा है। ब्रिटेन में रहकर हिंदी सीख रहे कुछ युवा इन दिनों भारत यात्रा पर हैं। इन युवाओं ने बुधवार को अमर उजाला के कार्यालय आकर 'हिंदी हैं हम' अभियान को जाना। साथ ही हिंदी और भारत यात्रा के बारे में अपने अनुभव साझा किए।
यूके हिंदी समिति ने उठाई जिम्मेदारी
ब्रिटेन में कुछ प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को सिखाने का जिम्मा उठाया है। दरअसल, ब्रिटेन की एक संस्था 'यूके हिंदी समिति' की ओर से पिछले कुछ सालों से युवाओं को हिंदी भाषा सिखाई जा रही है। संस्था की ओर से ब्रिटेन के बर्मिंघम, लीड्स, नॉटिंघम और बेलफास्ट में हिंदी सिखाई जाती है। यह संस्था स्विट्जरलैंड में भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी उठा रही है। संस्था की ओर से हर साल प्रतियोगिता भी कराई जाती है ताकि हिंदी का प्रचार-प्रचार हो सके।
विदेशियों को पता है हिंदी का महत्व
ब्रिटेन में हिंदी का महत्व समझने वालों की भी कमी नहीं है। प्रवासी भारतीयों के बच्चों हो या फिर दूसरे देश के निवासी, उन्हें हिंदी का महत्व अच्छे से पता है। इसलिए ऐसे लोग हिंदी सीखने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें से कुछ पिछले 14-15 साल से हिंदी को सीख रहे हैं और अब अन्य लोगों को भी सिखा रहे हैं।
भारत घूमने आए छात्र जमैल गिब्सन ने बताया कि वे ब्रिटेन में रहते हैं, लेकिन उनका परिवार मूल रूप से वेस्ट इंडीज से है। उनकी नानी जमैका, दादा सेंट विसेंट और दादी सेंट लूसिया से थीं। जमैल काफी समय से ब्रिटेन में रहते हैं और पेशे से वकील हैं। उन्होंने कहा कि वे अंग्रेजी के साथ ही दूसरी भाषा सीखना चाहते थे। उन्होंने हिंदी को इसलिए चुना क्योंकि वे हिंदी संगीत से प्रभावित हुए और हर बार सब टाइटल नहीं पढ़ना चाहते थे। जमैल ने हिंदी सीखने की शुरुआत की और अब उन्हें हिंदी सीखते हुए करीब 14 साल हो गए हैं। इतने सालों के बाद जमैल काफी अच्छी हिंदी भी बोलते हैं।
खुद हिंदी सीखी, अब बेटियों को पढ़ा रहीं
जमैल के अलावा एक और रोमानियाई नागरिक वॉयलेता भोजवानी को भी हिंदी से काफी लगाव है। वे रोमानिया की नागरिक हैं और उन्होंने कई भाषाएं सीखी हैं। उनका कहना है कि एक-दो विदेशी भाषा सीखने के बाद हिंदी सीखना काफी आसान था। पूरी तरह से हिंदी सीखने के बाद वॉयलेता नए शब्दों का उपयोग करना चाहती हैं। उन्होंने एक भारतीय से शादी की है। उनके पति राजस्थान से हैं। उनकी दो बेटियां हैं और वे उन्हें भी हिंदी सिखाती हैं।
पिता ने प्रेरित किया, फिर सीखी हिंदी
यूके हिंदी समितिPC: अमर उजाला
भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक दुष्यंत लिवरपूल में रहते हैं। दुष्यंत भी संस्था के साथ भारत के दौरे पर आए हैं। उन्होंने बताया कि वे पिछले तीन-चार साल से हिंदी सीख रहे हैं। जब वे 10-12 साल के थे, तब उनके पिता ने उन्हें हिंदी सीखने के लिए कहा। शुरुआत में उन्हें परेशानी हुई, लेकिन अब वे भी काफी बेहतर हिंदी बोलते हैं।
हिंदी के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को जाना
ब्रिटेन से आए कृष्णम् अचारी ने बताया कि वे लंदन के नजदीक रहते हैं। हिंदी सीखने की शुरुआत उन्होंने इसलिए की क्योंकि उनके सभी रिश्तेदार हिंदी में बात करते हैं, हिंदी बोलते हैं, लेकिन उन्हें हिंदी नहीं आती थी। अब हिंदी सीख रहे हैं और भारत आने के बाद काफी अच्छा लग रहा है। भारत आकर यहां की परंपराओं को देख रहे हैं और काफी करीब से इस देश की संस्कृति को अनुभव कर रहे हैं।
पहले दौरे से सीख मिली, फिर हिंदी सीखी
भारत दौरे पर आईं आर्या पटेल वैसे तो गुजरात से संबंध रखती हैं, लेकिन ब्रिटेन में ही पली-बढ़ी हैं। इसलिए उन्हें भी हिंदी नहीं आती थी। परिवार में अब गुजराती के साथ हिंदी भी बोली जाती है। उन्होंने बताया कि जब वे पहली बार भारत आईं तो उन्हें कुछ भी समझ नहीं आया। यहां पर सब कुछ हिंदी में था, इसलिए काफी परेशान हुईं। ब्रिटेन लौटने के बाद उन्होंने हिंदी सीखनी शुरू की और अब हिंदी में बात करने पर काफी अच्छा महसूस करती हैं।
दोस्तों से कुछ शब्द हिंदी में
यूके हिंदी समितिPC: अमर उजाला
हिंदी की छात्रा धृति शाह ने हिंदी के बारे में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि शुरुआत में हिंदी की कुछ चीजों को आसानी से सीख लिया, लेकिन कुछ में परेशानी हुई और काफी समय लगा। कई बार हार भी मानी, लेकिन फिर से हिंदी को सीखना शुरू किया। उनके मुताबिक, हिंदी में आसानी से भावनाएं जाहिर की जा सकती हैं। वे दोस्तों के साथ अंग्रेजी में बात करती हैं, लेकिन कुछ खास बातों को हिंदी में ही कहना पसंद करती हैं।
हार्दिक भी ब्रिटेन के लिवरपूल से हैं। उनके माता-पिता भी लंबे समय से ब्रिटेन में रहते हैं। उनका परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ से है। उनके घर में भी हिंदी में बात होती है और वे भी अपने परिवार से हिंदी में ही बात करना चाहते हैं। इसलिए ब्रिटेन में रहकर भी हिंदी सीख रहे हैं।
30 साल से हिंदी पढ़ा रही हैं सुरेखा
विदेश में रहकर इन छात्रों को पिछले 30 साल से हिंदी पढ़ाने का काम कर रही हैं सुरेखा चोपला। सुरेखा यूके हिंदी समिति की ट्रस्टी और अध्यक्ष हैं। निजी क्षेत्र में उन्हें 40 साल का अनुभव है। वे पहले भी हिंदी सिखाती थीं, बाद में इस संस्था से साल 2000 में जुड़ गईं। उन्होंने बताया कि वे काफी कम उम्र में भारत से ब्रिटेन गई थीं। वहां रहने वाले भारतीयों की युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति को जान सके इसलिए उन्होंने हिंदी पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने बताया कि वहां रहने वाले भारतीय मूल के ज्यादातर लोगों को दिवाली के अलावा अन्य त्योहारों की जानकारी काफी कम थी, लेकिन हिंदी सिखाने के साथ ही उन्होंने लोगों को अन्य जानकारियां भी देनी शुरू की।
सुरेखा के मुताबिक, व्यावहारिक हिंदी का ज्ञान काफी जरूरी है। भारत आना उन्हें काफी पसंद है। यहां आकर उन्हें काफी कुछ सीखने को मिलता है। वे कहती हैं कि ब्रिटेन में जितने ज्यादा लोग हिंदी सीख सकें, उतना ही बेहतर है। हिंदी सिखाने के लिए सुरेखा चोपला को साल 2016 में लंदन में भारतीय उच्चायोग की ओर से जॉन गिलक्रिस्ट अवार्ड भी मिल चुका है।
22 साल से हिंदी पढ़ा रहीं सीमा
सीमा वेदी भी सुरेखा चोपला की तरह ब्रिटेन में साल 2000 से हिंदी पढ़ाती हैं। सीमा वेदी भी यूके हिंदी समिति में ट्रस्टी हैं। उनके मुताबिक हिंदी काफी प्यारी भाषा है। ब्रिटेन में इसे पढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम भी बनाया गया है। पाठ्यक्रम बनाते समय दूसरी भाषाओं का भी ध्यान रखा गया है। ब्रिटेन में हिंदी के लिए तीन तरह से परीक्षाएं होती हैं, जिसमें लिखना, पढ़ना और बोलना शामिल हैं।
भारत दौरे पर आए ब्रिटेन के इन युवाओं का कहना था कि विदेशियों को हिंदी सीखने के लिए प्रेरणा देने का काम बॉलीवुड ने भी किया है। हिंदी गाने, फिल्में, फिल्मी सितारे और संगीतकारों के विदेशों में भी काफी प्रशंसक हैं। ब्रिटेन में ही जन्म लेने वाले भारतवंशियों की भी हिंदी में काफी दिलचस्पी है।
भारत में है अंग्रेजी का जोर
यूके हिंदी समितिPC: Amar Ujala
इन युवाओं ने बताया कि विदेशों में बसे भारतवंशी हिंदी का महत्व जानकर इसे सीखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर भारत की नई पीढ़ी का जोर अंग्रेजी पर ज्यादा दिखाई देता है। यहां इस तरह की मानसिकता बढ़ती जा रही है कि अगर आपको अंग्रेजी आती है तो आप सब कुछ पा सकते हैं। भारत के ऐसे ही लोगों को हिंदी का महत्व बताने की जरूरत है।
आगे पढ़ें
यूके हिंदी समिति ने उठाई जिम्मेदारी
कमेंट
कमेंट X