अवसर पर आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला जहाँ सूतक काल से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया था। जैसे ही ग्रहण काल का समय निकट आया, संगम तट मंत्रों की गूंज और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा और बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने गंगा की शीतल लहरों में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ कमाया। मंदिर के कपाट बंद होने के कारण लोगों ने संगम की रेती और घाटों पर बैठकर ही ध्यान, जप और मानसिक पूजा का सहारा लिया क्योंकि मान्यता है कि इस विशेष समय में किया गया दान और तप अक्षय फल प्रदान करता है। ग्रहण की समाप्ति के बाद तिल, अनाज और वस्त्रों के दान का सिलसिला चलता रहा ।