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मिले आर्थिक व तकनीकी मदद... तो बंधुआकला बने पीतल उद्योग की नगरी

सुल्तानपुर में लखनऊ-वाराणसी राष्ट्रीय मार्ग पर बसे बंधुआकला कस्बा में बनने वाले पीतल, तांबा, कांस्य और फूल के बर्तन पूरे देश में प्रसिद्ध थे। इस उद्योग में लगे कारीगर अपनी अद्वितीय कला और कौशल से पीतल और कांस्य के बर्तनों को बनाते हैं। ये न केवल सुंदर होते हैं, बल्कि उनकी गुणवत्ता भी अद्वितीय है। एक समय में यहां के बर्तनों की चमक विदेशों में भी दिखाई पड़ती थी। राजे रजवाड़ों में शादी विवाह से लेकर हर तरह के मांगलिक कार्यक्रमों में बंधुआ कला के पीतल, फूल व कांस्य के बर्तनों को पसंद किया जाता था। मुगलकाल से लेकर ब्रिटिश काल तक बंधुआकला में बर्तन व्यवसाय के लिए स्वर्णिम युग था। लेकिन, आज जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से यहां की कारीगरी को उद्योग का दर्जा नहीं मिल सका। यदि समय पर बर्तन व्यवसाय के उत्थान को सरकारी सहायता मिलती तो आज बंधुआ कस्बा की पहचान पीतल नगरी के रूप में होती। पहले कस्बा के ठठेरी बाजार की पहचान औद्योगिक मोहल्ले के रूप में थी। यहां के लगभग 200 घरों से बर्तनों के निर्माण की खनक सुनाई पड़ती थी। बटुआ, लोटा, हंडा, परात, खखरा आदि हर छोटे बड़े सामान बनते थे। मुरादाबाद, मिर्जापुर, लखनऊ, बाराबंकी, कानपुर, फैजाबाद, जौनपुर के अलावा नेपाल, वर्मा, भूटान तक के व्यापारी यहां से बर्तनों का व्यापार करते थे। यहां बर्तन निर्माण से जुड़े व्यवसायी शिवम सिंह कसेरा कहते हैं कि जिला उद्योग केंद्र को पीतल व कांस्य के बर्तन निर्माण व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए ऋण, अनुदान व सब्सिडी के माध्यम से व्यवसायियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। कारीगर राम मिलन का कहना है कि जिला उद्योग केंद्र बर्तन बनाने वाले कारीगरों के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रमों का आयोजन करके नई तकनीकों और आधुनिक मशीनों के बारे में जानकारी देकर बर्तन निर्माण व्यवसाय को नई ऊंवाई पर पहुंचा सकते हैं। कारीगर ईशु कसेरा का कहना है कि सरकारी विभाग को पीतल बर्तन व्यवसाय के उत्थान के लिए बाजार, विपणन व्यवस्था तथा बंधुआ में निर्मित बर्तनों को प्रदर्शित करने के लिए मेले व प्रदर्शनी का आयोजन करना चाहिए तथा कच्चचे माल की आपूर्ति पीतल की सीट व अन्य सामानों के लिए भी आगे आना चाहिए। जिससे बंधुआ का बर्तन उद्योग एक बार फिर से अपनी चमक बिखेरे। पंजीकरण, लाइसेंस की प्रणाली भी सरल करने की जरूरत है।

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