जिले में प्राकृतिक आपदाओं और बड़े त्योहारों के दौरान राहत-बचाव की जिम्मेदारी संभालने वाले आपदा मित्रों की स्थिति चिंताजनक है। बाढ़, नदी हादसों और छठ, माघ, सावन जैसे अवसरों पर जान जोखिम में डालकर ड्यूटी करने के बावजूद इन्हें न तो कोई मानदेय मिलता है और न ही किसी प्रकार का पारिश्रमिक दिया जाता है। वर्ष 2022 से जिले में 500 से अधिक आपदा मित्र और सखियां फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में काम कर रहे हैं। इन्हें एसडीआरएफ कैंप में विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें फर्स्ट रेस्पॉन्डर, तैराकी, अग्निशमन और सर्पदंश से निपटने जैसी तकनीकें शामिल हैं। इसके बाद से ये आपदा की हर स्थिति में सबसे पहले मौके पर पहुंचकर राहत कार्य संभालते हैं। राष्ट्रीय आपदा मित्र एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप कुमार का कहना है कि जिले में जहां-जहां आपदा मित्रों की ड्यूटी लगाई गई, वहां अब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ। नदी में डूबने या अन्य दुर्घटनाओं के समय एसडीआरएफ या एनडीआरएफ के पहुंचने से पहले यही लोग स्थानीय स्तर पर बचाव अभियान संभालते हैं। इसके बावजूद इन आपदा मित्रों को किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिल रही है। ऐसे में उनके सामने परिवार के भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है। कई बार धरना-प्रदर्शन के माध्यम से सरकार और प्रशासन को अपनी समस्याओं से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका है। उनहोंने कहा कि आपदा मित्रों की मांग है कि उन्हें न्यूनतम वेतन दिया जाए, राहवीर योजना और मुख्यमंत्री विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम से जोड़ा जाए तथा दुर्घटना बीमा की राशि पांच लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये की जाए।